पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/७३८

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हसी-दिल्लगी गिरा हायसे छुटकर लड़का । उसे देग्य मेरा जी भड़ा। उसे उठानेको जब कृदा। तब यह काम हुआ बेहदा । लड़का वड़का हाथ न आया। पर छातीमें धक्का खाया । चेले बोले मिलकर मारे। धन्य गुरुजी भाग हमारे। आप तो थे खटियापर सोते। अगर कहीं घोड़ेपर होते ? -भारतमित्र, मन, १८. ई. गुरूजीका हाल कहा गुरूजी कैसा हाल। रह गई चोटी उड़ गई खाल । फैलाये कितने ही जाल। गली नहीं पर मेरी दाल । रही हमारी जो कुछ पोल। यारोंने सब डाली खोल । नाहक मैं उलझा बेतौर। किया नहीं कुछ पहले गौर । "टिड्ढाणं" ी ढाल बनाई। उल्टी सीधी खूब सुनाई । पर आखिरको मुँहकी खाई। अपनी करनी आगे आई। जान गये सब लड़के बच्चे। नौकर चाकर अकलके कच्चे। जान गई देखो घरवाली। नौकर चाकर पीटं ताली। जा चाकरनी पान लगाती। वह भी हमें देख मुसकाती । इससे सबको भेजा घर। तनहा करते यहां गुजर । बैठे थे हम मनको मारे। भाईबन्द आ गये सारे । मोटे मोटे लठ्ठ उठाये। बोले,-कल्लू कस बुलवाये । तो संग को करि सके मरोरि। अभी देहि हम माथा फोरि । करनेको तब मदत हमारी। लगी दौड़ने दुनियां सारी । सबके आगे जोड़े हाथ। खूब दिया भई तुमने साथ । आये पहले हाथीराम। कोई न जाने जिनका नाम । हैं कृतज्ञ हम सबके भाई। अंकाबंका सजन कसाई । । ७२१ ।