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174 : प्रेमचंद रचनावली-6
 


किसी को देह पर लत्ता नहीं। ले जाओ सबको नदी में डुबा दो। सिसक-सिसककर मरने से तो एक दिन मर जाना फिर भी अच्छा है। कब तक पुआल में घुसकर रात काटेंगे और पुआल में घुस भी लें, तो पुआल खाकर रहा तो न जायगा। तुम्हारी इच्छा हो, घास ही ख़ाओ, हमसे तो घास न खाई जायगी।

यह कहते-कहते वह मुस्करा पड़ी। इतनी देर में उसकी समझ में यह बात आने लगी थी कि महाजन जब सिर पर सवार हो जाय, और अपने हाथ में रुपये हों और महाजन जानता हो कि इसके पास रुपये हैं, तो असामी कैसे अपनी जान बचा सकता है।

होरी सिर नीचा किए अपने भाग्य को रो रहा था। धनिया का मुस्कराना उसे दिखाई नहीं दिया। बोला-मजूरी तो मिलेगी। मजूरी करके खायंगे। धनिया ने पूछा-कहां है इस गांव में मजूरी? और कौन मुंह लेकर मजूरी करोगे? महतो नहीं कहलाते?

होरी ने चिलम के कई कश लगाकर कहा-मजूरी करना कोई पाप नहीं। मजूर बन जाय, तो किसान हो जाता है। किसान बिगड़ जाय तो मजूर हो जाता है। मजूरी करना भाग्य में न होता तो यह सब विपत क्यों आती? क्यों गाय मरती? क्यों लड़का नालायक निकल जाता?

धनिया ने बहू और बेटियों की ओर देखकर कहा-सब-की-सब क्यों घेरे खड़ी हो, जाकर अपना-अपना काम देखो। वह और हैं जो हाट-बाजार से आते हैं, तो बाल-बच्चों के लिए दो-चार पैसे की कोई चीज लिए आते हैं। यहां तो यह लोभ लग रहा होगा कि रुपये तुड़ाएं कैसे? एक कम न हो जायगा, इसी से इनकी कमाई में बरक्कत नहीं होती। जो खरच करते हैं, उन्हें मिलता है। जो न खा सकें, उन्हें रुपये मिलें ही क्यों? जमीन में गाड़ने के लिए?

होरी ने खिलखिलाकर कहा-कहां है वह गाड़ी हुई थाती?

'जहां रखी है, वहीं होगी। रोना तो यही है कि यह जानते हुए भी पैसे के लिए मरते हो चार पैसे की कोई चीज लाकर बच्चों के हाथ पर रख देते तो पानी में न पड़ जाते। झिंगुरी से तुम कह देते कि एक रुपया मुझे दे दो, नहीं मैं तुम्हें एक पैसा न दूंगा, जाकर अदालत में लेना, तो वह जरूर दे देता।'

होरी लज्जित हो गया। अगर वह झल्लाकर पचीसों रुपये नोखराम को न दे देता तो नोखे क्या कर लेते? बहुत होता बकाया पर दो-चार आना सूद ले लेते, मगर अब तो चूक हो गई।

झुनिया ने भीतर जाकर सोना से कहा-मुझे तो दादा पर बड़ी दया आती है। बेचारे दिन भर के थके-मांदे घर आए, तो अम्मां कोसने लगीं। महाजन गला दबाए था, तो क्या करते बेचारे।

'तो बैल कहां से आएंगे?'

'महाजन अपने रुपये चाहता है। उसे तुम्हारे घर के दुखड़ों से क्या मतलब?'

'अम्मां वहां होतीं, तो महाजन को मजा चखा देतीं। अभागा रोकर रह जाता।'

झुनिया ने दिल्लगी की-तो यहां रुपये की कौन कमी है? तुम महाजन से जरा हंसकर बोल दो, देखो सारे रुपये छोड़ देता है कि नहीं। सच कहती हूं, दादा का सारा दुःख-दलिद्दर दूर हो जाय।