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गोदान : 219
 


उन्होंने चंदे की सूची रायसाहब के हाथ में रख दी। पहला नाम राजा सूर्यप्रतापसिंह का था, जिसके सामने पांच हजार रुपये की रकम थी। उसके बाद कुंवर दिग्विजयसिंह के तीन हजार रुपये थे। इसके बाद कई रकमें इतनी या इससे कुछ कम थीं। मालती ने पांच सौ रुपये दिए थे और डाक्टर मेहता ने एक हजार रुपये।

रायसाहब ने अप्रतिभ होकर कहा--कोई चालीस हजार तो आप लोगों ने फटकार लिए।

मेहता ने गर्व से कहा-यह सब आप लोगों की दया है। और यह केवल तीनेक घंटों का परिश्रम है। राजा सूर्यप्रतापसिंह ने शायद ही किसी सार्वजनिक कार्य में भाग लिया हो, पर आज तो उन्होंने बे-कहे-सुने चैक लिख दिया। देश में जागृति है। जनता किसी भी शुभ काम में सहयोग देने को तैयार है। केवल उसे विश्वास होना चाहिए कि उसके दान का सद्व्यय होगा। आपसे तो मुझे बड़ी आशा है, मिस्टर खन्ना।

खन्ना ने उपेक्षा-भाव से कहा-मैं ऐसे फजूल के कामों में नहीं पड़ता। न जाने आप लोग पच्छिम की गुलामी में कहां तक जायंगे। यों ही महिलाओं को घर से अरुचि हो रही है। व्यायाम की धुन सवार हो गई, तो वह कहीं की न रहेंगी। जो औरत घर का काम करती है, उसके लिए किसी व्यायाम की जरूरत नहीं। और जो घर का कोई काम नहीं करती और केवल भोग-विलास में रत है, उसके व्यायाम के लिए चंदा देना मैं अधर्म समझता हूं।

मेहत जरा भी निरुत्साह न हुए-ऐसी दशा में मैं आपसे कुछ मांगूगा भी नहीं। जिस आयोजन में हमें विश्वास न हो, उसमें किसी तरह की मदद देना वास्तव में अधर्म है। आप तो मिस्टर खन्ना से सहमत नहीं हैं रायसाहब?

रायसाहब गहरी चिंता में डूबे हुए थे। सूर्यप्रताप के पांच हजार उन्हें हतोत्साह किए डालते थे। चौंककर बोले-आपने मुझसे कुछ कहा?

'मैंने कहा, आप तो इस आयोजन में सहयोग देना अधर्म नहीं समझते?'

'जिस काम में आप शरीक हैं, वह धर्म है या अधर्म, इसकी मैं परवाह नहीं करता।'

'मैं चाहता हूं, आप खुद विचार करें और अगर आप इस आयोजन को समाज के लिए उपयोगी समझें, तो उसमें सहयोग दें। मिस्टर खन्ना की नीति मुझे बहुत पंसद आई।'

खन्ना बोले-मैं तो साफ कहता हूं और इसीलिए बदनाम हूं।

रायसाहब ने दुर्बल मुस्कान के साथ कहा-मुझमें तो विचार करने की शक्ति ही नहीं। सज्जनों के पीछे चलना ही मैं अपना धर्म समझता हूं।

'तो लिखिए कोई अच्छी रकम।'

'जो कहिए, वह लिख दूं।'

'जो आपकी इच्छा।'

'आप जो कहिए, वह लिख दूं।'

'तो दो हजार से कम क्या लिखिएगा?'

रायसाहब ने आहत स्वर में कहा-आपकी निगाह में मेरी यही हैसियत है?

उन्होंने कलम उठाया और अपना नाम लिखकर उसके सामने पांच हजार लिख दिए। मेहता ने सूची उनके हाथ से ले ली, मगर उन्हें उतनी ग्लानि हुई कि रायसाहब को धन्यवाद देना भी भूल गए। रायसाहब को चंदे की सूची दिखाकर उन्होंने बड़ा अनर्थ किया, यह शूल उन्हें व्यथित करने लगा।