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246 : प्रेमचंद रचनावली-6
 


नोहरी मर्दों को नचाने की कला जानती थी। अपने जीवन में उसने यही विद्या सीखी थी। नोखेराम पढ़े-लिखे आदमी थे। कानून भी जानते थे। धर्म की पुस्तकें भी बहुत पढ़ी थीं। बड़े-बड़े वकीलों, बैरिस्टरों की जूतियां सीधी की थीं, पर इस मूर्ख नोहरी के हाथ का खिलौना बने हुए थे। भौंहें सिकोड़कर बोली-समय का फेर है, यहां आ गई, लेकिन अपनी आबरू न गवाऊंगी।

ब्राह्मण सतेज हो उठा। मूंछें खड़ी करके बोला-तेरी ओर जो ताके, उसकी आँखें निकाल लूं।

नोहरी ने लोहे को लाल करके घन जमाया-लाला पटेसरी जब देखो मुझसे बेबात की बात किया करते हैं। मैं हरजाई थोड़े ही हूं कि कोई मुझे पैसे दिखाए। गांव-भर में सभी औरतें तो हैं, कोई उनसे नहीं बोलता। जिसे देखो, मुझी को छेड़ता है।

नोखेराम के सिर पर भूत सवार हो गया। अपना मोटा डंडा उठाया और आंधी की तरह हरहराते हुए बाग में पहुंचकर लगे ललकारने-आ जा बड़ा मर्द है तो। मूंछें उखाड़ लूंगा, खोदकर गाड़ दूंगा। निकल आ सामने। अगर फिर कभी नोहरी को छेड़ा तो खून पी जाऊंगा। सारी पटवारगिरी निकाल दूंगा। जैसा खुद है, वैसा ही दूसरों को समझता है। तू है किस घमंड में?

लाला पटेश्वरी सिर झुकाए, दम साधे जड़वत् खड़े थे। जरा भी जबान खोली और शामत आ गई। उनका इतना अपमान जीवन में कभी न हुआ था। एक बार लोगों ने उन्हें ताल के किनारे रात को घेरकर खूब पीटा था, लेकिन गांव में उसकी किसी को खबर न हुई थी। किसी के पास कोई प्रमाण न था। लेकिन आज तो सारे गांव के सामने उनकी इज्जत उतर गई। कल जो औरत गांव में आशय मांगती आई थी, आज सारे गांव पर उसका आतंक था। अब किसकी हिम्मत है जो उसे छेड़ सके। जब पटेश्वरी कुछ नहीं कर सके, तो दूसरों की बिसात ही क्या।

अब नोहरी गांव की रानी थी। उसे आते देखकर किसान लोग उसके रास्ते से हट जाते थे। यह खुला हुआ रहस्य था कि उसकी थोड़ी-सी पूजा करके नोखेराम से बहुत काम निकल सकता है। किसी को बटवारा कराना हो, लगान के लिए मुहलत मांगनी हो, मकान बनाने के लिए जमीन की जरूरत हो, नोहरी की पूजा किए बगैर उसका काम सिद्ध नहीं हो सकता। कभी-कभी वह अच्छे-अच्छे आसामियों को डांट देती थी।

आसामी ही नहीं, अब कारकुन साहब पर भी रोब जमाने लगी थी। भोला उसके आश्रित बनकर न रहना चाहते थे। औरत की कमाई खाने से ज्यादा अधम उनकी दृष्टि में दूसरा काम न था। उन्हें कुल तीन, रुपये माहवार मिलते थे, यह भी उनके हाथ न लगते। नोहरी ऊपर ही ऊपर उड़ा लेती। उन्हें तमाखू पीने को धेला मयस्सर नहीं, और नोहरी दो आने रोज के पान खा जाती थी। जिसे देखो, वही उन पर रोब जमाता था। प्यादे उससे चिलम भरवाते, लकड़ी कटवाते, बेचारा दिन-भर का हारा-थका आता और द्वार पर पेड़ के नीचे झिलंगे खाट पर पड़ा रहता। कोई एक लुटिया पानी देनेवाला भी नहीं। दोपहर की बासी रोटियां रात को खानी पड़तीं और वह भी नमक या पानी और नमक के साथ।

आखिर हारकर उसने घर जाकर कामता के साथ रहने का निश्चय किया। कुछ न होगा एक टुकड़ा रोटी तो मिल ही जायगी, अपना घर तो है।

नोहरी बोली-मैं वहां किसी की गुलामी करने न जाऊंगी।

भोला ने जी कड़ा करके कहा-तुम्हें जाने को तो मैं नहीं कहता। मैं तो अपने को कहता