पृष्ठ:गोदान.pdf/२७४

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ प्रमाणित हो गया।
274 : प्रेमचंद रचनावली-6
 


'सिलिया! इतनी रात गए कैसे आई? वहां तो सब कुसल है?'

'हां, सब कुसल है। जी घबड़ा रहा था। सोचा, चलूं, सबसे भेंट करती आऊं। दिन को तो छुट्टी ही नहीं मिलती।'

'तो क्या नदी थहाकर आई है?'

'और कैसे आती। पानी कम था।'

मथुरा उसे अंदर ले गया। बरोठे में अंधेरा था। उसने सिलिया का हाथ पकड़कर अपनी ओर खींचा ।सिलिया ने झटके से हाथ छुड़ा लिया। और रोब से बोली-देखो मथुरा, छेड़ोगे तो मैं सोना से कह दूंगी। तुम मेरे छोटे बहनोई हो, यह समझ लो। मालूम होता है, सोना से मन नहीं पटता।

मथुरा ने उसकी कमर में हाथ डालकर कहा-तुम बहुत निठुर हो सिल्लो? इस बखत कौन देखता है?

'क्या मैं सोना से सुंदर हूं? अपने भाग नहीं बखानते कि ऐसी इन्दर की परी पा गए। अब भौंरा बनने का मन चला है। उससे कह दूं तो तुम्हारा मुंह न देखे।

मथुरा लंपट नहीं था, सोना से उसे प्रेम भी था। इस वक्त अंधेरा और एकांत और सिलिया का यौवन देखकर उसका मन चंचल हो उठा था। यह तंबीह पाकर होश में आ गया। सिलिया को छोड़ता हुए बोला-तुम्हारे पैरों में पड़ता हूं सिल्लो, उससे न कहना। अभी जो सजा चाहो, दे लो।

सिल्लो को उस पर दया आ गई। धीरे से उसके मुंह पर चपत जमाकर बोली-इसकी सजा यही है कि फिर मुझसे ऐसी सरारत न करना, न और किसी से करना, नहीं सोना तुम्हारे हाथ से निकल जायगी।

'मैं कसम खाता हूं सिल्लो, अब कभी ऐसा न होगा।'

उसकी आवाज में याचना थी। सिल्लो का मन आंदोलित होने लगा। उसकी दया सरस होने लगी।

'और जो करो?'

'तो तुम जो चाहना करना।'

सिल्लो का मुंह उसके मुंह के पास आ गया था, और दोनों की सांस और आवाज और देह में कंपन हो रहा था। सहसा सोना ने पुकारा किससे बातें करते हो वहां?

सिल्लो पीछे हट गई। मथुरा आगे बढ़कर आंगन में आ गया और बोला-सिल्लो तुम्हारे गांव से आई है।

सिल्लो भी पीछे-पीछे आकर आंगन में खड़ी हो गई। उसने देखा, सोना यहां कितने आराम से रहती है। ओसारी में खाट है। उस पर सुजती का नर्म बिस्तर बिछा हुआ है, बिल्कुल वैसा ही, जैसा मातादीन की चारपाई पर बिछा रहता था। तकिया भी है, लिहाफ भी है। खाट के नीचे लोटे में पानी रखा हुआ है। आंगन में ज्योत्स्ना ने आइना-सा बिछा रखा है। एक कोने में तुलसी का चबूतरा है दूसरी ओर जुआर के ठेठों के कई बोझ दीवार से लगाकर रखे हैं। बीच में पुआलों के गट्ठे हैं। समीप ही ओखल है, जिसके पास कूटा हुआ धान पड़ा हुआ है। खपरैल पर लौकी की बेल चढ़ी हुई है और कई लौकियां ऊपर चमक रही हैं। दूसरी ओर की ओसारी में एक गाय बंधी हुई है। इस खंड में मथुरा और सोना सोते हैं। और लोग दूसरे खंड में होंगे।