सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:गो-दान.djvu/५०

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
४८
गोदान
 


फटती है?पाल-पोसकर जवान कर दिया,यह उसका इनाम है?हमने न पाला होता तो आज कहीं भीख माँगते होते। रूख की छाँह भी न मिलती।

⁠होरी को ये शब्द ज़रूरत से ज्यादा कठोर जान पड़े। भाइयों का पालना-पोसना तो उसका धर्म था। उनके हिस्से की जायदाद तो उसके हाथ में थी। कैसे न पालतापोसता? दुनिया में कहीं मुंह दिखाने लायक रहता?

⁠हीरा ने जवाब दिया-हम किसी का कुछ नहीं जानते। तेरे घर में कुत्तों की तरह एक टुकड़ा खाते थे और दिन-भर काम करते थे। जाना ही नहीं कि लड़कपन और जवानी कैसी होती है। दिन-दिन भर सूखा गोवर बीना करते थे। उस पर भी तू बिना दस गाली दिये रोटी न देती थी। तेरी-जैसी राच्छसिन के हाथ में पड़कर जिन्दगी तलख हो गयी।

⁠धनिया और भी तेज हुई-जबान सँभाल,नहीं जीभ खींच लूंगी। राच्छसिन तेरी औरत होगी। तू है किस फेर में मूंडी-काटे,टुकड़े-खोर,नमक-हराम।

⁠दातादीन ने टोका--इतना कटु-वचन क्यों कहती है धनिया?नारी का धरम है कि गम खाय। वह तो उजड्ड है,क्यों उसके मुंह लगती है?


⁠लाला पटेश्वरी पटवारी ने उसका समर्थन किया--बात का जवाब बात है,गाली नहीं। तूने लड़कपन में उसे पाला-पोसा;यह क्यों भूल जाती है कि उसकी जायदाद तेरे हाथ में थी?

⁠धनिया ने समझा,सब-के-सब मिलकर मुझे नीचा दिखाना चाहते हैं। चौमुख लड़ाई लड़ने के लिए तैयार हो गयी--अच्छा,रहने दो लाला!मैं सबको पहचानती हूँ। इस गाँव में रहते बीस साल हो गये। एक-एक की नस-नस पहचानती हूँ। मैं गाली दे रही हूँ,वह फूल बरसा रहा है,क्यों?

⁠दुलारी सहुआइन ने आग पर घी डाला--बाकी बड़ी गाल-दराज औरत है भाई!मरद के मुंह लगती है। होरी ही जैसा मरद है कि इसका निबाह होता है। दूसरा मरद होता तो एक दिन न पटती।।

⁠अगर हीरा इस समय ज़रा नर्म हो जाता,तो उसकी जीत हो जाती;लेकिन ये गालियाँ सुनकर आपे से बाहर हो गया। औरों को अपने पक्ष में देखकर वह कुछ शेर हो रहा था। गला फाड़कर बोला--चली जा मेरे द्वार से,नहीं जूतों से बात करूँगा। झोंटा पकड़कर उखाड़ लूंगा। गाली देती है डाइन!बेटे का घमण्ड हो गया है। खून....

⁠पासा पलट गया। होरी का खून खौल उठा। बारूद में जैसे चिनगारी पड़ गयी हो।आगे आकर बोला-अच्छा बस,अब चुप हो जाओ हीरा,अब नहीं सुना जाता। मैं इस औरत को क्या कहूँ।जब मेरी पीठ में धूल लगती है,तो इसी के कारन। न जाने क्यों इससे चुप नहीं रहा जाता।

⁠चारों ओर से हीरा पर बौछार पड़ने लगी। दातादीन ने निर्लज्ज कहा,पटेश्वरी ने गुण्डा बनाया,झिगुरीसिंह ने शैतान की उपाधि दी।दुलारी सहुआइन ने कपूत कहा।