पृष्ठ:चंद्रकांता संतति भाग 6.djvu/४८

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दूसरा-और जब तक वे लोग न आवेंगे तब तक हमें यहाँ अटकना पड़ेगा।

इन्द्रदेव-बेशक !

तीसरा-व्यर्थ यहाँ अटके रहना तो अच्छा न होगा।

इन्द्रदेव-तब क्या किया जाय?

तीसरा-आप लोग जल्दी से वहाँ पहुँचकर अपना काम कीजिये और मुझे अकेले इसी जगह छोड़ दीजिए, मैं आपके आदमियों का इन्तजार करूँगा और जब वे आ जायेंगे तो सब चीजें लिए आपके पास पहुँच जाऊँगा ।

इन्द्रदेव-अच्छी बात है, मगर उन सब चीजों को क्या तुम अकेले उठा लोगे?

तीसरा-उन सब चीजों की क्या हकीकत है, कहिए तो आपके आदमियों को भी उन चीजों के साथ पीठ पर लाद कर लेता आऊँ ।

इन्द्रदेव-शाबाश ! अच्छा रास्ता तो न भूलोगे ?

तीसरा-कदापि नहीं, अगर मेरी आँखों पर पट्टी बाँध कर भी आप वहाँ तक ले गये होते तब भी मैं रास्ता न भूलता और टटोलता हुआ वहाँ तक पहुंच ही जाता ।

इन्द्रदेव-(हँस कर) बेशक तुम्हारी चालाकी के आगे यह कोई कठिन काम नहीं है । अच्छा हम लोग जाते हैं, तुम सब चीजें लेकर हमारे आदमियों को फौरन वापस कर देना।

इतना कह कर इन्द्रदेव ने उस तीसरे नकाबपोश को उसी जगह छोड़ा और दो नकाबपोशों को साथ लिए हुए आगे की तरफ बढ़े।

जिस सुरंग की राह से राजा वीरेन्द्रसिंह वगैरह उस तिलिस्मी बँगले में गये थे उससे लगभग आध कोस उत्तर को हटकर और भी एक सुरंग का छोटा सा मुहाना था जिसका बाहरी हिस्सा जंगली लताओं और बेलों से बहुत ही छिपा हुआ था। इन्द्रदेव दोनों नकाबपोशों को साथ लिए तथा पेड़ों की आड़ देकर चलते हुए इसी दूसरी सुरंग के मुहाने पर पहुंचे और जंगली लताओं को हटा कर बड़ी होशियारी से इस सुरंग के अन्दर घुस गये।


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देवीसिंह को चम्पा की सचाई पर भरोसा था और वह उसे बहुत ही नेक तथा पतिव्रता भी समझते थे, जिस पर चम्पा ने देवीसिंह के चरणों की कसम खाकर विश्वास दिला दिया था कि वह नकाबपोशों के घर में नहीं गई और कोई सबब न था कि देवीसिंह चम्पा की बात झूठ समझते । इस जगह यद्यपि देवीसिंह पुनः चम्पा को देखकर क्रोध में आ गये थे, मगर तुरन्त ही नीचे लिखी बातें विचार कर ठण्डे हो गये और सोचने लगे-

"क्या मुझे पहचानने में धोखा हुआ ? नहीं-नहीं, मेरी आँखें ऐसी गन्दी नहीं है । तो क्या वास्तव में वह चम्पा ही थी जिसे अभी मैंने देखा या पहले भी देखा था !