पृष्ठ:चाँदी की डिबिया.djvu/१५०

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चांदी की डिबिया [अङ्क - बार्थिविक पलंग पर चले गये ? कौन जानता है तुम कहां चले गये मुझे तुम्हारे ऊपर अब विश्वास नहीं रहा । मुझे क्या कि तुम ज़मीन पर पड़ रहे होगे। जैक [बिगड़ कर ] ज़मीन पर नहीं, मैं- बार्थिविक [ सोफ़ा पर बैठ कर ] इसकी किसे परवाह है कि तुम कहां सोये थे ? उस वक्त क्या होगा जब वह कह देगा...... डूब मरने की बात होगी ! मिसेज़ बार्थिविक क्या ? [सबाटा] बात क्या हुई, बोलते क्यों नहीं ?