पृष्ठ:चाँदी की डिबिया.djvu/१४९

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दृश्य २] चोदी की डिबिया m वार्थिविक [ उसकी तरफ मुड़ कर नहीं तुम ! अजी-तुम-तुम कुछ जानती नहीं । [तेज़ आवाज़ से आखिर ! वह रोपर कहां मर गया ! अगर वह इस दलदल से निकलने की कोई राह निकाल दे, तो मैं जानूं कि वह किसी काम का आदमी है ! मैं बदकर कहता हूँ कि इससे निकलने का अब कोई रास्ता नहीं है । मुझे तो कुछ सूझता नहीं। इधर सुनिये, अब्बाजान को क्यों दिक करती हो ? मैं केवल इतना ही कह सकता हूँ कि मैं थक कर बेदम हो गया था, और मुझे इसके सिवा कुछ याद नहीं है कि मैं घर आया । [ बहुत मंद स्वर में ] और रोज की तरह पलंग पर जाकर सो रहा ।