पृष्ठ:जनमेजय का नागयज्ञ.djvu/१००

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तीसरा अङ्क―तीसरा दृश्य

[ सब नाग चिल्ला कर दोडते है। युद्ध होता है। नाग अश्व पर अधिकार कर लेते हैं। दूसरी ओर से चण्ड भार्गव और जनमेजय सौनिकों के साथ आकर नागों को भगाते और अश्व छुडा ले जाते हैं। मणिमाला का प्रवेश। ]

मणिमाला―क्या ही वोर दप से पूर्ण मुख श्री है! प्रणय- वृक्ष, तू कैसे भयानक पानी से टकरानेवाले कगारे पर लगा है! पिता! नहीं, तुम नहीं मनोगे। ओह! क्षण भर में कितना भीषण रक्तपात हो गया।

[ घायलों को देखती है। मनसा का पुनः प्रवेश। ]

मनसा―कौन? मणिमाला!

मणिमाला―हाँ बूआ, देखो तुम्हारी उत्तेजना ने क्या परि णाम दिखलाया। आहा! वेचारे का हाथ ही कट गया है!

मनसा―( गम्भीर होकर ) बेटो, सचमुच यह बड़ा भयानक दृश्य है। इसे देखकर तो मेरा भी हृदय काँप उठा है।

मणिमाला―नहीं बूआ, तुम न काँपो। तुम त्रिशूल लिए हुए वज्र कठोर चरणो से इन शवा पर रण चण्डो का ताण्डव नृत्य करो। ससार भर की रमणीयता और कोमलता वीभत्स क्रन्दन करे, और तुम्हारे रमणी सुलभ मातृभाव को धज्जियाँ उड़ जाँय! विश्व भर में रमणियों के नाम का आतङ्क छा जाय। सेवा, वात्सल्य, स्नेह तथा इसी प्रकार की समस्त दुर्वलताओ के कहीं चिह्न तक न रह जायँ, क्योंकि सुनती हूँ, इन सब विडम्बनाओं से केवल स्त्रियाँ ही कलङ्कित हैं। हाँ बूआ, एक बार विकट हुङ्कार कर दा!

मनसा―बस बेटी, बस अधिक नहीं। मेरी भूल थी, पर