पृष्ठ:जनमेजय का नागयज्ञ.djvu/१९

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जनमेजय का नाग-यज्ञ
[ दोनों धनुष सँभालते और वाण चलाते हैं। पूर्व-परिवर्तित दृश्य अदृश्य हो जाता है। ]

मनसा―देखा यादवी! कैसी विलक्षणता है! यह बनावटी परोपकार, और ये विश्व के ठेकेदार! ओह! इन्ही को तुम प्रशंसा करती हो, जिनके अत्याचार से निरीह नागो का निर्वासन हुआ, और दुर्गम हिमावृत चोटियों के मार्ग से कष्ट सहते हुए उन्हे इस गान्धार देश की सीमा में आना पड़ा! देखो, अपने आर्यों की यह समता! फिर यदि नागो ने आभीरो से मिलकर यादवियो का अपहरण किया, तो क्या बुरा किया? यदि नागराज तक्षक ने श्रृंगी ऋषि से मिलकर परीक्षित का संहार किया, तो क्या अनिष्ट किया? इस विश्व में बुराई भी अपना अस्तित्व चाहती है। मैने नाग जाति के कल्याण के लिये अपना यौवन एक वृद्ध तपस्वी ऋषि को अर्पित कर दिया है। केवल जातीय प्रेम से प्रेरित होकर मैंने अपने ऊपर यह अत्याचार किया है!

सरमा―और मैंने विश्व-मैत्री तथा साम्य को आदर्श बनाकर नाग-परिणय का यह अपमान सहन किया है! मायाविनी, यह कैसा कुहक दिखाया! ओह! अभी तक सिर घूम रहा है!

मनसा―बिलकुल इन्द्रजाल है! यादवी, यह विद्या हम नागों की पैतृक सम्पत्ति है।

सरमा―किन्तु यह जानकर भी तुमने उलटी ही बात सोची! आश्चर्य है! मनसा, तुम्हारा कलुषित हृदय कैसे शुद्ध होगा?

मनसा―आर्यों को इसका प्रतिफल देकर। उन्हें इस हृदय