पृष्ठ:जनमेजय का नागयज्ञ.djvu/२५

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तीसरा दृश्य
स्थान इन्द्रप्रस्थ में जनमेजय को राजसभा
[ जनमेजय, तुर और सभासदगण ]

जनमेजय―भगवन्! फिर भी कोई सीमा होनी चाहिए। राजपद का इतना अपमान!

तुर―राजन्! वसुन्धरा के समान चक्रवर्ती का हृदय भी उदार और सहनशील होना चाहिए। उसे व्यक्तिगत मानापमान पर ध्यान न देना चाहिए। और ब्राह्मणों को तो सदा सन्तुष्ट रखना चाहिए; क्योंकि ये ही सन्तुष्ट रहने पर राष्ट्र का हितचिन्तन करते हैं। इसीलिये इनका इतना सम्मान है।

जनमेजय―किन्तु आर्य, मैंने तो कोई ऐसी बात नहीं की, जिससे पुरोधा अप्रसन्न हों। और उन्हें तो राष्ट्र के उत्कर्ष से प्रसन्न होना चाहिए था, न कि उलटे वे मुझे मना करते कि तुम अभी तक्षशिला पर चढ़ाई न करो।

तुर―उन्होंने इसी मे तुम्हारा कुछ हिन विचारा होगा। सम्भव है, उनकी समझ की भूल हो; या तुम्हीं इसको न समझ सके हो।

जनमेजय―आर्य, अभी में उस प्रदेश को विजय किए चला आ रहा हूँ। आपको नहीं मालूम, वे वन्य जातियाँ किस तरह सभ्य और सुखी प्रजा को तङ्ग किया करती थी। कन्याओं का