पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/१०१

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चोर ध्यान ले जाता है, काम, क्रोध आादि की भीषणता दिखाने को वह ऐसे प्रबल चोरों को सामने करता है जिसका घर का कोना कोना देखा हो और जो दिन रात चोरी की ताक में रहते हों ।

सादृश्य की योजना में पहले यह देखना चाहिए कि जिस वस्तु, व्यापार या गुण के सदृश वस्तु व्यापार या गुण सामने लाया जाता है वह ऐसा तो नहीं है जो किसी भाव-—स्थायी या क्षणिक—का आालंबन या आलंबन का अंग हो। यदि प्रस्तुत वस्तु व्यापार आदि ऐसे हैं तो यह विचार करना चाहिए कि उनके सदृश अप्रस्तुत या व्यापार भी उसी भाव के आालंबन हो सकते हैं या नहीं । यदि कवि द्वारा लाए हुए अप्रस्तुत वस्तु व्यापार ऐसे हैं तो कविकर्म सिद्ध समझना चाहिए । उदा हरण के लिये रमणी के नेत्र, वीर का युद्धार्थ गमन हृदय की कोमलता लीजिए। इन तीनों के वर्णन क्रमशः रतिभाव,उत्साह औऱ श्रद्धा द्वारा प्रेरित समझे जायेंगे और कवि का मुख्य उद्देश्य यह ठहरेगा कि वह श्रोता को भी इन भावों की रसात्मक अनुभूति कराए । अत:जब कवि कहता है कि नेत्र कमल के समान हैं, वीर सिंह के समोन झपटता है और हृदय नवनीत के समान है तो ये सदृश वस्तुएँ सौंदर्य,वीरत्व और कोमल सुखदता की व्यंजना भी साथ ही साथ करेंगी। इनके स्थान पर यदि हम रसात्मकता का विचार न करके केवल नेत्र के आकार झपटने की तेजी और प्रकृति की नरमी की मात्रा पर ही दृष्टि रखकर कहें कि नेत्र बड़ी कौड़ी या बादाम के समान हैं, 'वीर बिल्ली की तरह झपटता है'औऱ हृदय सेमर के घूए के समान है। तो कायोपयुकत कभी न होगा। कवियों की प्राचीन परंपरा में जो उपमान बँधे चले ना रहे हैं उनमें से अधिकांश सौंदर्य आदी की अनुभूति के उतेजक होने के कारण रस में सहायक होते हैं । पर कुछ ऐसे भी हैं जो आाकार आदि ही निर्दिष्ट करते हैं; सौंदर्य की अनुभूति अधिक करने में सहायक नहीं होते --जैसे जंघों की उपमा के. लिये हाथी की सूड़ नायिका की कटि की उपमा के लिये भिड़ या की कमर इत्यादि । इनसे आकार के चढ़ाव, उतार औौर कटि की सूक्ष्मता भर का ज्ञान होता है, सौंदर्य की भावना नहीं उत्पन्न होती , क्योंकि न तो हाथी की सूड़ में ही दांपत्य रति के अनुकूल आनु रंजनकारी सौंदर्य है और न भिड़ की कमर में ही। अतः रसात्मक प्रसंगों में इस बात का ध्यान रहना चाहिए कि अप्रस्तुत (उपमान ) भी उसी प्रकार के भाव के उत्तेजक हो, प्रस्तुत जिस प्रकार के भाव का उत्तेजक हो ।

उपयुक्त कथन का यह अभिप्राय कदापि नहीं कि ऐसे प्रसंगों में पुरानी बँधी हुई उपमाएँ ही लाई जायँ, नई न लाई जायें । ‘सुप्रसिद्धि' मात्र उपमा का कोई दौष नहीं, पर नई उपमाओं की सारी जिम्मेदारी कवि पर होती है । अतः रसात्मक प्रसंगों में ऊपर लिखी बातों का ध्यान रखना आवश्यक है । जहाँ कोई रस स्फूट न भी हो वहाँ भी यह देख लेना चाहिए कि किसी पात्रके लिये जो उपमान लाया जाय वह उस भाव के अनुरूप हो जो कवि ने उस पात्र के संबंध में अपने हृदय में प्रतिष्ठित किया है औौर पाठक के हृदय में भी प्रतिष्ठित करना चाहता है । राम की सेवा करते हुए लक्ष्मण के प्रति श्रद्धा का भाव उत्पन्न होता है अतः उनकी सेवा का यह वर्णन जो गोस्वामी जी ने किया कुछ खटकता है