पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/११

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


१ '३ ) वहाँ गर्टि' कर दिया गया हैं । इसी प्रकार ‘रकांना’ (अरकांसें दौलत अर्थात । सरदार या उमरा) का ‘ रगांना करके ‘अलग होना अंर्थ किया गया है। ही अच्छा था । उदाहरण के लिये दो शब्द काफी हैं ने स्थान स्थान पर शब्दों को व्युत्पत्ति भी दी हुई मिलती है जिसका दिया जाना पउनारि--पयोनाली, कमल की डंडी । अहट-ग्रन्थ, न उठने थोक्रय । पौरशब्द की ठीक व्युत्पति इस प्रकार है--सं० पत्र - नाल के T० पउम + नाल = हि० एउनाड़ या 0 नार। इसी प्रकार आहट = संo अचतुर्थ ? प्रा० , आहटु = है अहंठ (साढ़े तोन‘ई’ शब्द इस स बन है) । शब्दार्थों से हो टीक का अनुमान भी किया जा सकता है, फिर भी मनोरंजन के लिये कुछ पचों की टोका नीचे दी जाती है । (१) पहुठ हाथ तन सरपरहिया कवल तेलुि माँ । सुधाकी थ --रजा कहता है कि मेरा) हाथ तो अफुट अर्ल शक्ति के लग जाने से सामग्रहोन होकर बेकाम हो गया औौर मेरा) तनु सोवर है जिसके दय मध्य यर्थात् बीच में कम अनथ पद्मावती व सो हुई हैं । ठीक अर्थ-—साढ़े तीन हाथ का रोररूपी सरोर है जिसके मध्य में हृदय रूसी कमल है । (२) हिया थार कु व कंव ला । कनक कचोरि उछे जतु चारू। सुधाकरी यदि --ह दय थार में कुच कंचन का ल। है । (अथवा) जानों बल करके कनिक (आाट ) की कंचगे टती है अथर फूल रही है (चक्राकार उटते हुए स्तन कराही में फूलती हुई बदामी रंगको कचौरों से जान पड़ते हैं) ठौक अर्थ-मानो सोने के दर कटोरे उट हुए (शोध) हैं । (३) धानुक ग्राम, बे जग कीन्हा । 'क' का अर्थ शा न होने के कारण आपमें ‘वों' पार कर दिया और इस कार टीका कर दी -- सुधाकागे अर्थ--माप धानुक अर्थात् अहेरी होकर जग (के प्राणी) के बोझ कर लिया अर्थात् जगत के प्राणियों को भ्रधनु गौर कटाक्षेबाण से मारकर उन प्राणियों का बोझा त् ढेर कर दिया। ठीक अर्थ -श्राप धनुर्धर हैं और सारे जगत कों वेश्य या लक्ष्य किया है । । (४) नैहर चाह न पाउब जहाँ । सुधाकरी मर्थ--जहाँ हम लोग नेहर (जाने) की इंच (तक) ने कने पावेंगी। (पाउव' के स्थान पर ‘पाउबि' पाठ रखा गया है, शायद स्त्रीलिंग के । १. एक शब्द अध्युष्ट' भी मिलता है । पर वह केवल प्राकृत अनुद्धकी अt उपुत्पत्ति के लिये गढ़ा हुया जान पड़ता है। ।