पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/१११

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


( ह१ ) मलक फाँस गिउ मेलि ग्रसूझा । प्रधर प्रधर सों चाहते जूझा ॥ कुंभस्थल कुच दोउ मैमंता । पेलौं सौंह, सँभारह कंता ॥ इन दोनों उदाहरणों में प्रस्तुत रस के विरुद्ध सामग्री का आारोप है । यद्यपि साहित्य के प्राचार्यों ने साम्य से कहे हुए विरोधी रस या भाव को (विभाव आदि को भी) दोषाधायक नहीं माना है, पर इस प्रकार के ग्रारोपों से रस की प्रतीति में व्याघात अवश्य पड़ता है, वाग्धूदग्ध्य द्वारा मनोरंजन चाहे कुछ हो जाय । । काव्य में बिवस्थापना (इमैजरी) प्रधान वस्तु है । बाल्मीकि, कालिदास ग्रादि प्राचीन कवियों में यह पूर्णता को प्राप्त है । अंगरेजो कवि शेलो इसके लिये प्रसिद्ध है । भाषा के दो पक्ष होते । हैं--एक सांकेतिक (सिंबोलिक) और दूसरा विवाधायक (प्रेजेन्टेटिव ) । एक में तो नियत संकेत द्वारा अर्थवोध मात्र हो जाता। है, दूसरे में । वस्तु का बिंब या चित्र अंतकरण में उपस्थित होता है। वर्णनों में सच्चे कवि द्वितीय पक्ष का नालंबन करते हैं । वे वर्णन इस दंग पर करते हैं कि विबग्रहण हो अतः रसात्मक वर्णनों में यह आवश्यक है कि ऐसी वस्तुओों का fiव ग्रहण कराया ' जाय, ऐसी वस्तुएँ सामने लाई जायेंजो प्रस्तुत रस के अनुकूल हों, उसकी प्रतीति में बाधक न हों । सादश्य ऑौर साधर्य के प्राधार पर यूरोप द्वारा भी । जो वस्तुएँ लाई , वे भी ऐसी ही होनी चाहिए । बोररस की अनुभूति के समय कुचतरिबनसिंदूर नादि सामने लाना या शृंगाररस की अनुभूति के अवसर पर मस्त हाथी, भालेबरछेसामने रखना रसानुभूति में सहायक कदापि नहीं। बात की काटछाँटवाले अलंकार--जैसे, परिसंख्या-—यद्यपि जायसी में कम हैं। पर कई प्रसंगों में जहाँ किसी पात्र का वाक्चातुर्यदिखाना कवि को इष्ट है बाँ श्लेप अौर मुद्रा अलंकार का आश्रय बहत लिया गया है-यहाँ तक कि जी ऊबने लगता है । रैत्नसेन पद्मावती के प्रथम समागम के अवसर पर ज व सखियाँ पद्मावती को छिपा देती हैं तब राजा के रसायनी प्रलाप में धातुओं आदि के बहुत से नाम निकलते हैं, जैसे सो व रूप जासों दुख खोल । गए भरोस तहाँ का बोल । जहें लोना बिरवा जाती। कहि के फंदेस मान को पाती ॥ ज एहि घी मिलाबें मोहीं । सीस देखें बलिहारी ग्रोही ॥ राजा कहता है वह रूप (पद्मावती) सामने नहीं है जिसके आगे मैं अपना दुख खोलू ।"जहाँ वह सलोनी लता (पद्मावतो) है वहाँ संदेसा कहकर उसका पत्र कौन लावे ?' इत्यादि। इसमें श्लेप और म् द्रा दोनों अलंकार हैं । इसी प्रकार की एक उक्ति वियोगदशा में नागमतो को है धौरी पटूक कह पिउ नाऊँ जौं चित्त रोख न दूसर ठाऊँ जाहि बया होइ पिउ कंठ लवा। करै मे राव सोइ गौर ा ॥ अर्थात्-—सफेद और पीली (पांड्वर्ण) पड़कर भी मैं उस प्रिय का नाम लेती हैं (क्योंकि ) यदि मैं चित्त में रोष काँ तो मेरे लि थे और दूसरा ठिकाना नहीं