पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/१२४

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( १०४ ) देश को भक्तिरस मन किया उसका सबसे अधिक विरोध उन हिंसापूर्ण शाक्त मत और वाममार्ग से दिखाई पड़ा। मत्र तत्र के प्रयोग करनेवाले, भूत प्रेत, और यक्षिणी प्रादि सिद्ध करनेवाले तांत्रिक औौर शाक्तों के प्रति उस समय समाज के भाव कैसे हो रहे , इसका पता राघव चेतन के चरित्रचित्रण से मिलता है । । शाक्तमत विहित मंत्र तंत्र और प्रयोग आादि वेदविरुद्ध अनाचार के रूप में सम जाने लगे थे । गोस्वामी तुलसीदास ने भी कई जगह समाज की प्रवृत्ति का माभास दिया है, जैसे जे परिहरि हरिहरचरन भजहेि भूतगन घोर । तिनकी गति मोहि देहु विधि जो जननी मत मोर ॥ प्रेमप्रधान वैष्णव मत के इस पुनरुत्थान में अहिंसा का भाव यों तो सारी जनता में ग्रादरलाभ चुका था पर औौर फकीरों के हृदय में विशेष कर साधों रूप बढ़मूल हो गया था। क्या हिंदू, क्या म् सलमान, क्या सगुणोपासक, क्या स निर्गुणोपास, सब प्रकार के साधु और फकीर इसका महत्व स्वीकार कर चुके थे। कबीरदास का यह दोहा प्रसिद्ध हो है-- बकरी खाति । पाती है ताकी काढ़ी खाल । जा नर बकरी खात हैं तिनको कौन हाल ? ॥ इसी प्रकार और बहुत जगह कबीरदास जी ने पशु हिंसा के विरुद्ध वाणी सुनाई है, जैसे दिन को रोजा रहत , राति हनत हैं गाय यह तो खून, वह बंदगी, कह क्यों खुसी सुदाय ॥ है खीचरीमाँ परा टू क लोन माँस पराया खाय , गला कटावै कौन ? युद्धस्थल के वर्णन में, इस प्रकार प्रकट किए हैं। साधु प्रवृत्ति के अनुसार जायसी ने पशु हिंसा के विरुद्ध अपने विचार, जस माँसू भखा परावा। तस तिन्ह कर लेइ चौरन खावा ॥ जायसी लमान थे इससे उनकी उपासना निराकारोपासना , ही कही जायगी। पर सूफी मत की ओोर पूरी पासना की सी ही तरह झुकी होने के कारण उनकी उपासना में साकारो अद्वैतवाद ने एक बार म् सलमानी देशों में में यादि में आार्य संस्कार बहुत दिनों तक दबा न रह सका । के बड़ी हलचल मचाई थी।"ईरान, के बीच भी उसने अपना सिर । मंसूर हुक्म से शामी कट्टरपन प्रवाह चढ़ाया गया पर अनलहक' () न पहुँचे उठायाहल्लाज खलीफा के सूली पर हुए शायरों की प्रवृत्ति इसी अद्वैत पक्ष की ओोर रही । मैं ब्रह्म हूँकी नावाज बंद हुई । फारस के पैगंबरी एकेश्वरवाद (मोनोथेइज्म) और इस सिद्धांतभेद था । एकेश्वरवाद और बात है, अद्वैतवाद अद्वैतवाद (मोनिज्म) में बड़ा औौर बात । एकेश्वरवाद खस खाना । जिन्ह । उपासना के व्यवहार के लिये सूफी परमात्मा को