पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/१२९

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( १० ए ) (भावार्थ -हवीव ! सोचो तो, वही सर्वशक्तिमान ईश्वर प्रेममय भी है । मेघगर्जन के बीच से मनुष्य का सा यह स्वर सुनाई पड़ता है.—ह मेरे बनाए हुए . हृदय : इधर भी हृदय है । हे मेरे बनाए हुए मुखड़े ! मुझमें भी मुखड़ा देखा। तुझमें शक्ति नहीं है और न तू मेरी शक्ति का अनुमान कर सकता है । पर प्रेम मैंने तुझको दिया है कि तू मुझसे प्रेम कर जो तेरे लिये मर चुका है l) तत्वज्ञान संपन्न प्राचीन यूनानी (यवन) जाति के बीच जब पाल' नामक यहूदी स्थूल सीधे सादे प्रेममय ईसाई मत का प्रचार करने गया तब किस प्रकार ज्ञानमार्ग से भरे यूनानियों ने उस 'असभ्य यहदी' की बातों की पहले उपेक्षा की, पर पीछे उसके शांतिदायक संदेश पर मुग्ध हुए, यह बात वर्णन करने के लिये ब्राउनिंग ने इसी प्रकार के एक औौर पत्न की रचना की है । ब्राउनिंग के समान ही ऑौर योरोपियनों को भी यही धारणा थी कि प्रेमतत्व या भक्तिमार्ग का प्राविभव पहले पहल ईसाई मत में हुआा और ईसाई उपदेशकों द्वारा भिन्न भिन्न देशों में फैला। भारतवर्ष के ‘भागवत संप्रदाय' की प्राचीनता पूर्णतया सिद्ध हो जाने पर भी बहुतेरे अबतक उस प्रिय धारणा को छोड़ना नहीं चाहते। सच पूछिए तो भगवान् के हृदयकी पूर्ण भावना भारतीय भक्तिमार्ग में ही हुई । ईसाई मत को पीछे से भगवान् के हृदय का वहाँ तक आाभास मिला जहाँ तक उपास्य उपासक का संबंध है । व्यक्तिगत साधना के क्षेत्र के बाहर उस हृदय की खोज नहीं की गई। केवल इतने ही से संतोष किया गया कि ईश्वर शरणागत भक्तों के पापों को क्षमा करता है और सब प्राणियों में प्रेम रखता है । इतने से ईश्वर और मनुष्य के बीच के व्यवहार में तो वह हृदय दिखाई पड़ा पर मनुष्य मनुष्य के बीच के व्यवहार में अभिव्यक्त होनेवाले तथा लोकरक्षा और लोकरंजन करनेवाले हृदय की ओर ध्यान न गया । लोक में जिस हृदय से दीन दुखियों की रक्षा की जाती है, गुरुजनों का आदर सम्मान किया जाता है, भारी भारी अपराध क्षमा किए जाते हैं, अत्यंत प्रबल और असाध्य अत्याचारियों का ध्वंस अत्यंत करने भव्य में निर्वाह अद्भुत किया पराक्रम जाता दिखाया है, सारांश जाता यह है, नाना कि जिससे कर्तव्यों लोक औौर स्नेह का सुखद संबंधों परि का पालन होता है, वह भी उसी एक परम हृदयकी अभिव्यक्ति है, इसकी भावना भारतीय भक्तिपद्धति में ही हुई जिस समय निगुनिएटैक्तों की लोकधर्म से उदासीन या विमुख करनेवाली वाणी सर्वसाधारण कानों में ग "ज रही थी उस समय गोस्वामी तुलसीदास जी ने किस प्रकार भक्ति के उपयुक्त प्राचीन व्यापक स्वरूप की जनसाधारण के बीच प्रतिष्ठा की, गोस्वामी जी की आलोचना में हम दिखा चुके हैं । सूफी लोग साधक की क्रमश: चार अंवस्थाएँ कहते हैं--(१) शरीअत- अर्थात् धर्मग्रंथों के विधिनिषेध का सम्यक पालन । यह है हमारे यहाँ का कर्मकांड । (२) तरीकत-—अर्थात् बाहरी क्रियाकलाप से परे होकर केवल हृदय की शुद्धता द्वारा भगवान् का ध्यान से इसे उपासना कांड कह सकते हैं । (३) 'हकीकत भवित नौर उपासना के प्रभाव से सत्य का सम्यक् बोध जिससे साधक तत्वदृष्टि संपन्न और त्निकालज्ञ हो जाता है । इसे जानकांड समझिए। (४) ‘मारफत