पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/१३०

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( ११० ) प्रधत् सिद्धावस्था जिसमें कठिन उपवास औौर मौन प्रादि की साधना द्वारा अंत में साधक की मात्मा परमात्मा में लीन हो जाती है और वह भगवान् की सुंदर प्रेममयी प्रकृति (जमाल ) का अनुसरण करता हुआा प्रेममय हो जाता है । जायसी ने इन अवस्थाओं का उल्लेख अखरावट ’ में इस प्रकार किया है- कही सरीग्रत' चिस्ती पीरू। उधरित असरफ ऑी जाँगीरू ॥ राह 'हकीकतपरे न चूकी। पैठि ‘मारफत' बड़की यह कह झाए हैं कि जायसी को विधि पर पूरी यास्था थी। वे उसको साधना की पहली सोढ़ी कहते हैं जिसपर पैर रखे बिना कोई मागे बढ़ नहीं सकता-- साँची राह सरीघ्रतजेहि बिसवास न होइ । पाँव रखें तेहि सीढ़ी, निभरम पहुंचे सोइ ॥ साधक के लिये कहा गया है कि वह प्रकट में तो सब लोकव्यवहार करता रहे, सैकड़ों लोगों के बीच अपना काम करता रहे, पर भीतर हृदय में भगवान् की भावना करता रहेजैसा कि जायसी ने कहा है परगट लोक चार कटु वाता । गुपुत भाउ मन जासों राता ।। इसे 'खिलवत दर अंजुमन' कहते हैं । नफ्स के साथ जिहाद करते हुए इंद्रियदमन करते हुए-उस परमात्मा तक पहुँचने का जो मार्ग बताया गया है वह ‘तरीकतकहलाता है। इस मार्ग का अनुसरण करनेवाले को पुपिपासा सहनएकांतवास औौर मौन का नाश्रय लेना चाहिए इस मार्ग में कई पड़ाव हैं जो मुकामात' कहलाते हैं । इनमें से पहला मुकामहै । 'तौबा' । जायसी ने जो चार टिकान या बसेरे कहे हैं (चारि बसेरे सीं चढ़ेसत सौं उतर पार) वे या तो ऊपर कही हुई चार अवस्थाएँ हैं अथवा ये ही मुकामात हैं। वे ‘मु कामात' या अवस्थाएँ उन शुभ्यंतर ग्रवस्थाओं के अधीन हैं जो परमात्मा के अनुग्रह से कल्प या हृदय के बीच उपस्थित होती हैं औौर अहवालकहलाती हैं । इसी ग्रहाल' की अवस्था का प्राप्त होना हाल थाना' कहलाता है जिसमें भक्त अपने को बिल्कुल भूल जाता है और ब्रह्मानंद में झूमने लगता है । जायसी ने इन पद्यों में इसी अवस्था की ओर संकेत किया है कया जो परम तत्त मन लावा। शूमि माति, सुनि ऑौर न भावा ॥ जस मद पिए घू म कोइ नाद सुने घूम । तेहि में बरजे नौक है, चढ़े रहसि दूम ॥ इस हाल' या प्रलयावस्था के दो पक्ष हैं-त्यागपक्ष और प्राप्तिपक्ष । त्याग पक्ष के अंतर्गत हैं-(१) फना (अपनी अलग सत्ता की प्रतीति के परे हो जाना। (२) फकद (अहंभाव का नाश ) और सुक (प्रेममद) प्राप्तिपक्ष के अंतर्गत हैं १) बका (परमात्मा में स्थिति ), (२) वज्द (परमात्मा की प्राप्ति) और (३) शढ (शांति ) १. यह हाल' समाधि की अवस्था है जिसकी प्राप्ति सूफी एक भाव ईश्वर- प्रणिधान द्वारा ही मानते हैं ।