पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/१३४

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( ११४ ) परदा था भी घर नहीं भी था -श्रथति इस विचार से तो व्यवधान था कि उस स्वरूप का हम स्पर्श नहीं कर सकते थे और इस विचार से नहीं भी था कि उस व्यवधान में उस स्वरूप की छाया दिखाई पड़ती थी । प्रकृति की दो शक्तियाँ मानी जाती हैं -यावरण और बिक्षेप । आावरण द्वारा बह मू ल निर्गुण सत्ता के वास्तव स्वरूप को ढाँकती है और विक्षेप द्वारा उसके स्थान पर बदलनेवाले नाना रूपों को निकालती जब कि ये नाना रूप ब्रह्म ही के प्रतिबिंब तब हम यह नहीं कह सकते कि वह आावरण या परदा ऐसा है जिसमें न ह्म का ग्राभास बिल्कुल नहीं मिल सकता सरोवर में पानी था, पर पानी तक पहुँच नहीं होती थी उस शीतल करनेवाले तत्व की भलक मिलती पर उसकी प्राप्ति यों नहीं हो सकती पूर्ण साधना द्वारा यदि उसकी प्राप्ति हो जाए तो भवताप से चिरनिवृत्ति हो जाए ग़ौर आात्मा की प्यास सब दिन के लिये ले जाय ‘सरग प्राइ धरती मह बाबा स्वर्गीय श्रत तत्व इसी पृथ्वी में व्याप्त पर पकड़ म नहीं जाता। इसी भाव को जायसी ने अखरावट' में अधिक स्पष्ट रूप में प्रकट किया नापुहि घायु जो देर्श चहा । नापनि प्रभुत श्राप से कहा सवै जगत दरपन लेखा। आापुहि दरपनजापुहि देखा नापुहि बन नौ घायु पखेरू नापुहि सजाग्राषु अहेरू जापुहि पुहु फूलि बन फूले आाहि भंवर बासरस भूले नापुहि घट घट महें मुख चाहे आाहि मापन रूप सहै दरपन बालक हाथ, मुख देवेंदूसर गले तस भा दुइ एक साथ, मुहमद ए : जानिए 'नापुहि दरपन श्रापुहि देखा इस वाक्य से दृश्य ऑौर द्रष्टा, जेय औौर ज्ञाता का एक दूसरे से अलग न होना सूचित होता इस अर्थ को लेकर वेदांत में यह कहा जाता है कि ब्रह्म जगत् का केवल निमित्त कारण ही नहीं, उपादान कारण भ ‘नापुहि घायु जो देख चहा' का मतलब यह है कि अपनी ही शक्ति की लीला का विस्तार जब देखना चाहा। शक्ति या माया ब्रह्म ही की है, ब्रह्म से पृथकु उसकी कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं । ‘पापुहि घट घट महें मुख चाहै प्रत्येक शरीर में जो कुछ सौंदर्य दिखाई पड़ता वह उसी का किस प्रकार एक ही प्रखंड सत्ता के अलग अलग बहुत से प्रतिबिंब दिखाई पड़ते हैं, यह बताने के लिये जायसी यह पुराना उदाहरण देते गगरी सहस पचास, जो कोड पानी भरि धरे सूरज दिf अकास, महमद सत्र महें देखिए जिस ज्योति से मनुष्य उस परमहंस ब्रह्म की छाया देखता वह स्थिर है। क्योंकि वह ब्रह्म ही है। वह ब्रह्मज्योति अपनी माया से प्राच्छादित होने पर भी न उससे मिली हुई कही जा सकती है, न अलग-—मिली हुई इसलिये नहीं कि नाम रूपात्मक इश्यों का उसके स्वरूप पर कोई प्रभाव नहीं पड़ सकता, अलग इसलिये नहीं कि उसके साथ ही उसकी अभिव्यक्ति छायारूप में रहती परछाहों नयन ज्योति स विरति नाहीं जगमग जल महें दीसे जैसे । नाहि मिला नहि बैहरा तैसे