पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/१३३

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( ११३ ) पदमावत में श्रद्वैतवाद की झलक स्थान स्थान पर दिखाई पड़ती है । । अटू त वाद के अंतर्गत दो प्रकार के झूत का त्याग लिया जाता है--श्रात्मा औौर परमात्मा के द्वैत का तथा ब्रह्म ऑौर जड़ जगत् के हृत का । इनमें से सूफियों का जोर पहली बात पर ही समझना चाहिए। यजुर्वेद के वृहदारण्यक उपनिषद् का ‘अहं ब्रह्मास्मि' वाक्य जिस प्रकार न ह की एकता और अपरिच्छिन्नता का प्रतिपादन करता है उसी प्रकार सूफियों का मन नह' वाक्य भी। इस अद्वैतवाद के मार्ग में बाधक होता है अहंकार। यह अहंकार यदि टूट जाय तो इस ज्ञान का उदय हो जाय कि सब मैं ही हूँ, मुझसे अलग कुछ नहीं है। । हों हीं कहत स मति खोई । जौ तू नाहि ग्राहि सब कोई ॥ चापुहि गुरु सो पापुहि चेला। जापुहैि सब ऑौ ग्राषु अकेला ॥ ‘रावटमें जायसी ने सोहइस तत्व की अनुभूति से ही पूर्ण शांति की प्राप्ति बताई है सोई सोsहंबसि जो करई। सो बू, सो धीरज धरई ॥ वेदांत का अनुसरण करते हुए जायसी ब्रह्म और जगत् की समस्या पर भी जाते हैं औौर जगत् को ब्रह्म से अलग नहीं करते। जगत् की जो अलग सत्ता प्रतीत होती है, वह पारमार्थिक नहीं है, अवभास या छाया मात्र है जब चीन्हा तब औौर न कोई तन मन, जि, जीवन सब सोई ॥ ‘हीं हाँ’ कहत धोख इतराहीं । जब भा सिद्ध कहाँ परछाहीं ? चित् ग्रचित की इस अनन्यता के प्रतिपादन के लिये वेदांत विवर्तवादका आाश्रय लेता है जिसके अनुसार यह जगत् ब्रह्म का विवर्त (कल्पित कार्य) है । मूल सत्य द्रव्य ब्रह्म ही है जिसपर अनेक असत्य अर्थात् सदा बदलते रहनेवाले दृश्यों का अध्यारोप होता है । जो नामरूपात्मक दृश्य हम देखते हैं वह न तो ब्रह्म का वास्तव स्वरूप ही है, न ब्रह्म का कार्य या परिणाम ही है। । वह है केवल अध्यास या भ्रांतिज्ञान । उसकी कोई अलग सत्ता नहीं है । नित्य तत्व एक अह्म ही है । इसी सामान्य सिद्धांत के स्पष्टीकरण के लिये वेदांत में प्रतिबिंबबाद दृष्टिष्टिबाद, अवच्छेदवाद, अजातवाद (प्रौढ़िवाद) आदि कई वाद चलते हैं । 'प्रतिबिंबवादका तात्पर्य यह है कि नामरूपात्मक दृश्य (जग) ब्रह्म के प्रति बिंब हैं । । बिंब ब्रह्म है; यह जगत् उसका प्रतिबिंब है । ।“इस प्रतिचिववाद की ओोर जायसी ने ‘पदमावत' में बड़े ही अच्छे ढंग से संकेत किया है । दर्पण में पद्मिनी के रूप की झलक देख अलाउद्दीन कहता है देख एक कौतुक हीं रहा। रहा तरपट मै नहि महा ॥ सरवर देख एक मैं सोई । रहा पानि न पान न होई ॥ सरग प्राइ धरती महें छावा। रहा धरति, मै धरत न मावा ॥