पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/१४६

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( १२६ खलीफा भीतरी चक्रों की पूरी चर्चा रहो। हयोगियों वा नाथपंथियों की दो मुख्य वार्ता सूफियों श्रौर तर्गुण मतवाले संतों को सपने अनुकूल दिखाई पड़ीं--(१) रहर न त्ति, (२) ईश्वर को केवल मन के भीतर समझना और डू ना । कहने को आवश्यकता नहीं कि ये दोनों बातें भारतीय भक्तिमार्ग से पूरा मेल खानेवाली नहीं थीं । अवतारवाद के सिद्धांत रूप से प्रतिष्ठित हो जाने के कारण भारतीय परंपरा का भक्त अपने उपास्य को बाहर लोक के बीच प्रतिष्ठित देखता है, अपने हृदय के एकांत कोने में हो नहीं । पर फारस में भावात्मक मुद्र ‘रहस्यवाद ख व फै ला । वहाँ को शायरों पर इसका रंग बहुत गहरा चढ़ा । लोगों के कठोर धर्मशासन के बोच भी सूफियों को प्रेममयी वाण ने जनता भावमन कर दिया । इसलाम के प्रारंभिक काल में ही भारत का सिंध प्रदेश ऐसे सूफियों का अड्डा रहा जो यहाँ के वेदांतियों और साधकों के सत्संग से ग्रपने मार्ग की पुष्टि करते रहे श्रतः मुसलमानों का साम्राज्य स्थापित हो जाने पर हिंदुओं और मुसलमा समागम से दोनों के लिये जो एक सामान्य भक्ति मार्ग विभूत हु बढ़ गई रहस्यवाद को लेकरजिसमें वेदांत ग़ौर सूफी मत दोनों का मेल था। । पहले पह नामदेव ने, फिर रामानंद के शिष्य कोर ने जनता के बोच इस ‘सामान्य मार्ग को अटपटी वाणी सुनाई। नानक, दादू ग्रादि कई साधक इस नए माग अनुयायी हए ऑौर निर्माण संत मतचल पड़ा । इधर निर्गण भक्तिमाग पर यह निकला उधर भारत के प्राचोन सग्ण मार्ग' ने भी, जो पहले से चला जा रहा जोर पकड़ा और राम कृष्ण को भक्ति का स्रोत बड़े वे से हिंदू जनता के वो बहा । दोनों को प्रत्ति में बड़ा अंतर यह दिखाई पड़ा कि एक तो लोकपक्ष उदासोन होकर केवल व्यक्तिगत साधना का उपदेश देता रहा पर दूसरा आपने प्राचोन स्वरूस के अनुसार लोकपक्ष को लिए रहा। निर्जुन बानो वाले संतों के लो विरोधो स्वरूप को गोस्वामी तुलसोदास जो ने ग्री तरह पहचाना था । से जैसा कि भो कहा जा चुका है, रहस्यवाद का स्फुरण सूफियों में पूरा पूरा हुमा । कवोरदास में जो रहस्यवाद पाया जाता है वह अधिकतरे सूफियों के प्रभाव के कारण । पर कबोरदास पर इस्लाम के कट्टर एकेश्वरवाद औौर वेदांत के मायावाद का रूखा संस्कार भो पूरा पूरा था । उनमें वाक्चातुर्य था, प्रतिभा थी, पर प्रकृति के प्रसार में भगवान को कला का दर्शन करनेवालो भाव क्रता न थो। इससे रहस्य मयी परोक्ष सत्ता को ओर संकेत करने के लिये जिन दश्यों को वे सामने करते हैं वे अधिकतर वेदांत प्रौर हठयोग की बातों के बड़े किए हुए रू कि मात्र होते हैं । अतः कवोर में जो कुछ रहस्यवाद है। वह सत्र एक भावुक या कवि का रहस्यवाद नहीं है । हिंद के कवियों में यदि कहीं रम गोय श्रेौर सुंदर देती रहस्यवाद है तो जायसो में, जिनको भावुकता बहुत ही ऊँची कोटि को है । वे सूफियों की भक्ति- भावना के अनुसार कहीं तो परमात्मा को प्रियतम के रूप में देखकर जगत् के नाना रूपों में उस र्रियतम के रूम धर्म को छाया देखते हैं और कहीं सारे प्राकृतिक रूपों और व्यापारों को पुरु' के समागम के हेतु प्रकृति के गार, उत्कंठा या विरह