पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/१४७

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( १२७ ) विकलता के रूप में अनुभव करते हैं । दूसरे प्रकार की भावना पदमावत में अधिक मिलती है। प्रारंभ में कह नाए हैं कि ‘पदमावत' के ढंग के रहस्यवादपूर्ण प्रबंधों की परंपरा जायसी से पहले की है, मृगावती, मधुमालती आदि की रचना जायसी के पहले हो चुकी थी और उनके पीछे भी ऐसी रचनाओं की परंपरा चली। सबमें रहस्यवीं? कहा मौजूद जा है सकता । । अतः है हिंदी तो इन के कहानी पुराने कहनेवाले साहित्य में मुसलमान ‘रहस्यवादी कवियों कविसंप्रदाय का ही। यदि कोई जायसी कवि थे और भारतवर्ष के कवि थे । । भारतीय पद्धति के कवियों की दृष्टि फारसवालों की अपेक्षा प्राकृतिक वस्तुओं और व्यापारों पर कहीं अधिक विस्तृत तथा उनके मर्मस्पर्शी स्वरूपों को कहीं अधिक परखनेवाली होती है। इससे उस रहस्यमयी सत्ता का आभास देने के लिये जायसी बहुत ही रमणीय और मर्मस्पर्शी ,श्यसंकेत उपस्थित करने में समर्थ हुए हैं। । कबीर के चित्रों (इमैजरी) की न बह अनेकरूपता है, न वह मधुरता। देखिएउस परोक्ष ज्योति और सौंदर्य सत्ता की घोर कैसी लौकिक दीप्ति और सौंदर्य के द्वारा जायसी संकेत करते हैं बहुतै जोति जोति श्रोहि भई। रवि, सति, नखत दिपहि मोहि जोती । रतन पदारथमानिक मोती ॥ जहूँ जहूँ बिहंसि सुभावह हँसी । तहें तहें छिटकि जोति परसी ॥ नयन जो देखा “वल भा, निरमल नीर सरीर । हंसत जो देखा हंस भा, दसनजोति नग होर ॥ प्रकृति के बीच दिलाई देनेवालो सारी दीप्ति उंसी से है, इस बात का आाभास पद्मावती के प्रति रत्नसेन के ये वाक्य दे रहे हैं- अनु धनि ! तू निसिनर निसि माहाँ । हौं दिनिअर जेहि के तू छाहाँ ॥ चाँदहि कहाँ जोति औौ करा । सुरुज के जोति चाँद निरमरा ॥ अँगरेज कवि शेली की पिछली रचनाओं में इस प्रकार के रहस्यवाद की झलक बड़ी सुन्दर दृश्यावली के बीच दिखाई देती है । स्त्रीत्व का प्राध्यात्मिक आदर्श उपस्थित करनेवालों(एपीसाइकीडिअन) में प्रिया की मधुर वाणी प्रकृति के क्षेत्र में कहाँ कहाँ सुनाई पड़ती है इन सालो डस, हर वायस केम टू मी दि ह्निस्परिंग उड्स ऐंड फ्राम दि फाउन्टेंसएंड दि ऑोड डीप ाफ फ्लावर्स , लाइक लिप्स मरमरिंग इन देयर स्लीप ग्राफ दि स्वीट किसेज लूिच हैड लव्ड देम देयर, लोड बट श्राफ हर टु दि इनैमर्ड एनर; ऐंड फ्राम दि ब्रीजेज वृंदर लो भार लाउड, ऐंड फाम दि रेन श्राफ एनी पासिंग क्लाउड ऐंड फ्राम दि सिंगिंग ग्राफ दि समर बर्ड स, ऐंड फ्राम थाल साउंड्स, माल साइलेंस ।