पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/१५९

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( १३ ) . है । । जायगा तो चलनेवाला उड़ीसा में पहुँचेगा, अतः कुछ दूर बढ़ने पर उड़ीसा जाने वाला मार्ग छोड़कर श क रत्नसेन को दक्षिण को घोर घम पड़ने को कहता दक्षिण यू मने पर कलिग देश में समुद्र का घाट मिलेगा- नागे पाब उडैसा, बाएँ दिए सो बाट । दहिनावरत देड़ के, उत सम द के घाट ऊपर के विवरण से यह स्पष्ट हो जाता है कि जायसी ने चित्तौर से कलिग तक जाने का जो मार्ग लिखा है वह यों ही ऊटपटाँग नहीं है । उत्तरोत्तर पड़नेवाले प्रदेशों का क्रम ठीक है । जायसी को बहुत दूर दूर के स्थानों के नाम मालूम थे । ! बादशाह की दूती जब योगिनी बनकर चित्तौर गई है तब उसने अपने तथटन के वर्णन में बहुत से तीर्षों के नाम बताए हैं जिनमें से अधिकतर तो बहुत प्रसिद्ध हैंपर कुछ ऐसे प्रसिद्ध स्थान भी ग्राए हैं जिन्हें इधर के लोग कम जानते हैं, जैसे नागरकोट और बालनाथ का टीला गउघुख हरिद्वार फिरि की न्हिकें । नगर कोट कटि रसना दीन्हिकें । ढ ढ़िकें बालनाथ कर टीला। मथरा मथिऊँ न सो पिड मीला ॥ ‘नागरकोट' काँगड़े में है जहाँ लोग ज्वालादेवी के दर्शन को जाते हैं । ‘बालनाथ का टीला' भी पंजाब में है । सिंध और कैलम के बीच सिंध सागर दोजाब में जो नमक के पहाड़ पड़ते हैं उसी के अंतर्गत यह एक बहुत ऊंची पहाड़ी है जिसमें बालनाथ नामक एक योगी की गुफा है ।' साध यहाँ बहत जाते हैं । । इतिहास का ज्ञान भी जायसी को जनसाधारण से बहुत अधिक था । इसका एक प्रमाण तो ‘पदमावतका प्रबंध ही है । । जैसा कि प्रारंभ में कहा जा चुका है, पद्मिनी औौर हीरामन सूए की कहानी उत्तरीय भारत में, विशेषतः अवध में, बहुत दिनों से प्रसिद्ध चली आ रही है । कहानी बिल्कुल ज्यों की त्यों यही है । । पर कहानी। कहनेवाले राजा का नामबादशाह का नाम आदि कुछ भी नहीं बताते । वे यों हो कहते हैं कि 'एक राजा था', एक बादशाह था । समय के फेर से जैसे कहानी । इतिहास हो जाती है वैसे ही इतिहास कहानी। अतः जायसी ने जो चित्तौररत्नसेन अलाउद्दीन, गोराबादल आादि नाम देकर इस कहानी का वर्णन किया है उससे यह स्पष्ट है कि वे जानते थे कि घटना किस स्थान की ओर किस बादशाह के समय की है, पद्मिनी किसकी रानी थी और किस राजपूत ने युद्ध में सबसे अधिक बीरता दिखाई थी । इसके अतिरिक्त लाउद्दीन की ऑौर चढ़ाइयों का भी उन्हें पूरा पता था, ऐसे देवगिरि और रणथंभौर गढ़ पर की चढ़ाई का। देवगिरि पर चढ़ाई अलाउद्दीन ने अपने चाचा सुल्तान जलालुद्दीन के समय में ही सन् १२६ ई० में की थी । रण थंभौर पर चढ़ाई उसने बादशाह होने के चार वर्ष पीछे अर्थात् सन् १३०० मेंकी थी पर उसे ले न सका था। । दूसरे वर्ष सन् १३०१ में रणथंभौर गढ़ टूटा है और प्रसिद्ध वीर हम्मीर मारे गए हैं। ये दोनों घटनाएँ चित्तौर टूटने (सन् १३०१ ई०) १. बालनाथ नाथसंप्रदाय या गोरखपंथ के एक योगी हो गए हैं ।