पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/१६५

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( १४५ ) प्रथम ऊपर जो सकर्मक क्रिया के रूपों के उदाहरण दिए गए हैं वे ठेठ या पूरवी अवधी के हैं और उनमें पुरुषभेद बराबर बना हुआ है । पश्चिमी हिंदी की सकर्मक भू तकालिक क्रिया में पुरुपभेद नहीं रहता--जैसे, मैंने किया, तुमने किया, उसने किया। ठेठ अवधी के ऊपर दिए रूपों के अतिरिक्त जायसी और तुलसी दोनों एक सामान्य प्रकारांत रूप भी रखते हैं जिसका प्रयोग वे तीनों पुरुषों, दोनों लिगों और दोनों बचना में समान रूप से करते हैं, जैसे- उत्तम पुरुष ( १ ) का मैं बोया जनम मोहि जी ? ( २ ) हम तो तोहि द खाबा पीऊ। मध्यम ० ( ३ ) तुइ सिरजा यह समुद नपारा ( ४ ) अब तुम माइ ऑतरपट साजा। ( ५ ) भूलि चकोर दिस्टि तहें लाबा । ( ६ ) तिन्ह पाबा उत्तिम कलामू । वर्तमानकालिक क्रिया के रूप ब्रजभाषा के समान ही होते हैं। केवल मध्यम पुरुष एकवचन के रूप के अंत में संस्कृत के समान सि’ होता है जैसे करसि, जासि तू जुग सारि, चहसि पुनि [ा । विधि और प्राज्ञा में भी यही रूप रहता है, पर कभी कभी संस्कृत के समान 'हि' से अंत होनेवाला रूप भी जाता है, जैसे- ‘तू सपूत माता कर अस परदेस न लें हि । अंब ताई मुइ होइहि; मुए जाइ तिग देहि ॥ भविष्य के रूप ठेठ ग्रवधी के कुछ निज के होते हैं- उत्तम पुरुष (१) कौन उतर देवों तेहि पूछे । (एकवचन) मैं (२) कौन उतर पाउब पैसारू । (बहुवचन) हम प्रथम पुरुष (१) होइयह नाप औी जोख (एकवचन ) (२) देव बार सब हैं बारी। (बहुवचन) ‘होइहि’ पुराना रूप है। 'ह' के घिस जाने से आाजकल 'होई ( = होगा। बोलते इनमें उत्तम पुरुष के बहुवचन का जो रूप (पाउब ) है वह अवधी साहित्य में सब पुरुषों में मिलता है (यद्यपि बोलचाल में उत्तम पुरुष बहुवचन हमके ही साथ जाता है) । जायसी और तुलसी दोनों ने सब पुरुषों में और दोनों वचनों में इस रूप का व्यवहार किया है, जैसे- घर कैसे पेटब मैं छूछे (उत्तम पुरुष, एकवचन ) गु न अवगुन विधि पूब (प्रथम पुरुषएकवचन) पूरबी अवधी में साधारण क्रिया (इनफिनिटिव) का भी यही 'व' वणत रूप है ।