पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/१६६

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( १४६ ) ठेठ अवधी की एक बड़ी भारी विशेषता को सदा ध्यान में रखना चाहिए। खड़ी बोली और ब्रजभाषा दोनों में कारकचिह्न सदा क्रिया के साधारण रूप में लगते हैं, जैसे-'करने का’, ‘करने को ' या ‘करिवे को' 1 पर टेट या पूरबी अवधी में काकचिन प्रथम पुरुपएकवचन की वर्तमानकालिक क्रिया के से रूप में लगता है, जैसे ‘चावें कहें ‘खाय माँ ‘कर (क) दोन्हस नवन सुनें कहें मैना । (ख) सती होइ कहें सोस उधारा । कहीं कहीं कारकचित का लोप भी मिलता है, जैसे (क) जो नित चले सँवारे पाँखा। आाजे जो रहा कालि को राखा ॥ (ख) सवै सहेली देखें धाई । (चले = चलने के लिये; देखे = देखने के लिये ) इसी प्रकार संयुक्त क्रिया में भी जहाँ पहले साधारण क्रिया का रूप रहता है वहाँ भी अवधी में यही वर्तमान का सा रूप ही रहता है (क) तप लांगि अब जेठ असाढ़ी । (ख) मरे चहत्ते पे मरै न पाबहि । पूरबी अवधी में मागधी की 2 त्ति के अनुसार ब्रजभाषा के प्रोकारांत सर्व नामों के स्थान पर एकारांत सर्वनाम होते हैं, जैसे -—'को' ( = कौन) के स्थान पर ‘क’, ‘जो' के स्थान पर 'जे' और ‘कोऊ' के स्थान पर ‘के’ या ‘के हूं'। नीचे कुछ उदाहरण दिए जाते हैं (क) केइ उपकार मरन कर कीन्हा । ( = किसने (ख) के हू जिज दीन्ह कोन्ह संसारू। ( = जिसने (ग) तजा राम रावन, का केह ? ( = कोई ) (घ) जियत न रहा जगत म के उ ( = कोई) इन सर्वनामों का रूप विभक्ति और कारकचि न लगाने के पहले एकारांत ही रहता है (जैसेकेहि पर, जेहि पर) ; ब्रजभाषा या पश्चिमी अवधी के समान नाकारांत (जैसेजाको और जाकरतापर गौर ताप ) नहीं होता। जायसी औौर तुलसी दोनों की रचनाओं में एक विलक्षण नियम मिलता है । वे सकर्मक भूतकालिक क्रिया के कर्ता को तो संविभक्ति पूवी रूप केई, ‘जेइ’ 'तेइ' रखते हैं पर सकर्मक क्रिया के कर्ता का ‘को, जो, सो', जैसे (क) जो एहि खीर समुद महें परे । (ख) जो श्रोहि विर्स मॉरि के खाई ॥ अवधी के कारकचिन इस प्रकार हैं कत-+ कर्म-कहें (याधुनिक ‘काँ'), के करण--सन्, से (पश्चिमी अवधी ‘सी’) संप्रदान-कहें (याधुनिक ‘काँ'), के अपादान-—से (पश्चिमी अवधी ‘त’, ‘ले’) सबकरक