पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/१६८

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( १४८ ) हुए 'होना' क्रिया के रूप है । प्राकृत की हितो' विभक्ति भी वास्तव में ‘भू’ धातु से निकली है औौर ‘भूत्वा' शब्द का अपभ्रंश है । जायसी ने हंत' रूप में ही इस विभक्ति का बराबर प्रयोग किया है, जैसे-- (क) तेहि बंदि हंत 2 जो पावा। ( = बंदि से ) (ख) जल ह्नतें निकसिख भू वै नहि का। ( = जल से ) (ग) जब हृत कहिगा पंखि मंदेसी। (= जब से) (ध). बब हंत तुम बिनु रहै न जीऊ। ( = तब से ) ‘कारण’ और द्वाराके अर्थ में भी हंत' का प्रयोग होता हैं, जस (क) तुम हृत मंडप गइडें परदेसी । ( = तुम्हारे लि , तुम्हारे कारण) (ख) उन्ह ढंत देखे पाएई दरस गोसाई केर ( = उनके द्वारा) जायसी ने ठेठ पूबी ग्रवधी के शब्दों का जितना अधिक व्यवहार किया नीचे कुछ शब्दों के उदाहरण दिए जाते हैं (१) गंध जो मंत्री बोले सोई । तेहि डर गंध न बैठों, मकु साँवरि होइ जाऊं । (धि = निकट, पास ) इस का व्यवहार अब केवल यौगिक रूप में रह गया है, जैसे--राध शब्द पड़ोसीऔर । ठ शब्द लीजिए , जो साहित्यज्ञों को ग्राम्य लगेंगे (२) अहक मोरि पुरुषारथ देखेहूं । (महक = लालसा) (३) नौजि होड़ घर । ( पुरुप बिनानौजि = ईश्वर न करे । अरबी नऊज = विल्ला) ४) जहिया लंक दही श्री रामा। (जहिया = जब) ५) जी देखा तीबड़ है साँसा। (तीवई स्त्रो (६जस यह समूद दीन्ह दुख मोकाँ । मका - मोकॐ = मुझको) (७) जाना नहि कि होव मस भर्ती । (महूँ = मैं भी ) (८) हरि हहरि अधिक हि काँप अधिक ='नौर भी अधिक) पर जो पूवी अवधी के रूप दिखाए गए उनसे यह न समझना चाहिए कि तुलसी ने सर्वोनू रबी अवधी ही के व्याकरण का अनुसरण किया है। कवि ने जी के समान सकर्मक भू तकालिक क्रिया के लिग बचन अधिकतर पश्चिमी हिंदी के ढंग पर कर्म के आसार ही रखे हैं, जैसे बसिठन्ह प्राइ कही आस बाता। इसी प्रकार भतकालिक का पहपभेदशान्य भी प्राय: क्रिया पश्चिमी रूप मिलता है, जैसे तुम तौी लि मंदिर महें प्राई । इसके अतिरिक्त पश्चिमी साधारण क्रिया (इनफिनिटिव'न' व ) के रूप का प्रयोग भी कहीं कहीं देखा जाता है, जैसे कित आपन पुनि कित°मिल अपने हाथा। के खेलब एक साथा ॥