पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/१६९

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( १६ ) । पूरवी हिंदी में जबतक कोई कारकचिह्न नहीं ल गता तबतक संज्ञाों के बहु वचन का रूप वही रहता है जो एकवचन का। पर जासो ने पाँही हिंदी के चहुवचन रूप कहीं कहीं रखे हैं, जैसे- (क ) नसे भई सव ताँति । (ख) जोवन लाग हिलोरें लेई ॥ जायसी ‘तू' या ‘’ के स्थान पर अकसर ‘तु' का प्रयोग करते हैं । यह कनौजी और पश्चिमी अवधी का रूप है जो खीरी, शाहजहांपुर से लेकर कन्नौज तक बोला जाता है । खड़ी बोली और ब्रजभाषा दोनों पछाहीं बोलियों की प्रवृत्ति दीर्घात पदों की जोर है, पर अवधी को लध्वंत प्रवत्ति है। खडो बोलो और ब्रजभाषा में जो विशेषण औौर संबंकारक के सर्वनाम गाकारांत औौर ओोकारांत मिलते हैं वे अवधो में कारांत पाए जाते हैं । नोचे ऐसे कुछ शब्द दिए जाते हैं- खड़ी बोली अवधी ऐस जैसो तसों तैस या तस कंस या कस । ब्रजभाषा एस या आस जस या जस ट' बड़ीं। खोटो खर नीको नीक गहिरा गहिरी पतरो, पात। पाछिलो। पातर पाछिल। पिछला दूनों गोरा गोरो पियार ऊचा नीचा नीच नीचो अपनो