पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/१७३

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( १५३ ) 'पारना' क्रिया के रूप अब बंगाल ही में सुनाई पड़ते हैं पर जायसी श्रीर तुलसी के जमाने तक शायद वे अवध की बोलचाल में भी रहे हों, क्योंकि इनके पहले के कबोर साहब की वाणी में भी वे पाए जाते हैं। जो कुछ हो, जायसी और तुलसी दोनों ने इस पारना' ( = सकना) क्रिया का खूब व्यवहार किया है, (क) परी नाथ कोइ बुवं न पारा -—जायसी (ख) तुमहि मत को बरनै पारा ।--तुलसी यही दशा ‘आाधना' क्रिया की भी है। । यह निकली पड़ती अस् धातु से जान । है जिसके रूप पाली में अच्छतअच्छंति' ऑादि होते हैं । अब हिंदी में तो उसका वर्तमान कृदतरूप अछूत' या भाज़त' ही बोलचाल में , पर बैंगला में हैइसके गौर रूप प्रचलित हैं। । कबीर साहब औौर जायसी दोनों में इसके कुछ रूप पाए जाते हैं: (क) कह कबीर किछ अतिो न जहिया (प्रकिलो था; मिलाग्रो बेंगला छिलो') (ख) कंवल न पूछे जापनि बारी (ग्राउं = है; बँगला ‘') (ग) का निचित रे मानुष यापन चीते आलू। (प्राणु = रह) इसी प्रकार 'आादि' शब्द का प्रयोग बिल्कुल’ या निपट के अर्थ में अब के वल बंगभाषा में ही सुनाई पड़ता है, जैसेनदी में बिल्कुल पानी नहीं है = आदो जल नाय) ; पर जायसी ने 'पद्मावतमें किया है । बादलअपनी माता से कहता मातु न जानसि बालक ऑाँदी । हौं बादला सिह रनबादी ॥ प्रत् माता मुझे बिल्कुल बालक न समझ । वह सत्तार्थक होना क्रिया के रूपों के श्रादि में 'अ' अक्षर पहले रहता था अबतक अवध के कुछ हिस्सों में-और के आसपास-— -जायस अमेठी वर्तमान काल में बना हुया है । । वहाँ है' के स्थान में अहैबोलतेहैं । जायसी ने भूतकालिक । रूप ( = था) का भी व्यवहार किया है । सं भव है उस समय बोला जाता रहा हो। उदाहरण (क) भाँट आई ईसर के कला । (ख) परबत एक अहा ताँ हूँगा। (ग) जब लग गुरु हीं नहा न चान्हा। तुलसीदास जी में केवल वर्तमान का रूप ‘है' मिलता है । यह सत्तार्थक क्रिया ‘भू' धातु से न निकलकर असधातु से निकली जान पड़ती है। भू धातु से निकले। हुए पुराने प्राकृत कृदंत हुत' ( = था) का प्रयोग जायसी की भाषा में हमें प्रायः मिलता (क) हुत पहले नौ अब है सोई । (ख) गगन हुता नहि महि हतो, हुते चंद नहि सुर ।