पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/१७४

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( १५४ ) तथा ब्रज और बुंदेलखंड में यह शब्द ‘हतो’ इस रूप में अबतक बोला जाता है । । एक बहुत पुराना निश्चयवार्थक शब्द ‘पै' है जो निश्चय या ‘ही' के अर्थ में आाता है । यह ठीक नहीं मालूम होता कि यह अपि' शब्द से नाया है या और किसी शब्द से हैं क्योंकि 'अपि’ शब्द ‘भी' के अर्थ में जाता है । प्रयोग इसका जायसी ने बहत किया है । तुलसी ने कम किया है, पर किया है, जैसे- माँग माँग पै कहह पियकबन देह न लेह उच्चारण--दो से अधिक बर्मों के शब्द के ग्रादि में नस्व ‘ई’ औौर नस्व ’ के उपरांत ‘ग्रा' का उच्चारण अवधी को पसंद और पश्चिमी हिंदी (खड़ी और ) को है । इसी भिन्न प्रत्ति के अनुसार अवधी में बोले जानेवाले ब्रजनापसंद सियार, कियारी, बियारी, ‘वियाज, वियाह, पियार, नियाव, नादि शब्द तथा 'दुआर, कुआार, ‘बु आार, 'वाल' आादि शब्द खड़ी बोली और ब्रजभाषा में क्रमश: स्यार, क्यारीव्यारी, व्याज, व्याह, प्यारा, प्यारों, न्याव तथा द्वार, क्वार, ख्वार, दाल, जायग । ' बोले ‘इऔर ‘डके स्थान पर 'य' और ‘व' की इसी श्र व त्ति के अनुसार अवधी ‘इहाँ' , या ‘हाँ उहाँहियाँ, खड़ी बोली नौर ब्रजभाषा में यहाँ, ‘वहाँझाँ, ढाँ ‘ऑौर ‘’ बोले जाते हैं । इसी प्रकार ‘' औौर अा' के उपरांत अवधी को ‘ई’ पसंद है औौर को ‘य' जैसे-—अवधी के ब्रजभाषा ग्राइजाइपाइकराइ , , , तथा माइहै, जाइहै, पाइहैकराइहैअथवा अइह ', , (, जइहै, पइहै, करइहै) के स्थान पर ब्रजभाषा में क्रमशः ‘प्राय, । पाय, जायकराय, आयद, जाहैपायहै, करायहै (मथवा, नायहै = ऐहै, जायहै = है) इसी रुचिवैचिदय और 'उच्चारण (अज के कारण ऐश्री' का संस्कृत , समान) पचिमी हिंदी से , केवल और बका के पहले के जाता सा रहा‘यकार रह गया (जैसेगैया, कन्हैया) । पर यह अवधी में बना हुआ । इससे है । अवधी का उच्चारण अयऔर अबसा न करके आइऑौर अउसा जैसे-ऐस अइस, जैस जइस, भैस भंइस, दौरि दउरि इत्यादि । केवल पदांत के ‘ए’ और ‘प्रोका अय' और अव' करना , जैसे उच्चारण पच्छिमी हिंदी के सा चाहिए-कहै लाग = कहय लाग, तपे लाग = तपय लाग, चल = चलव इत्यादि । प्राकृत की एक पंचमी विभक्ति 'संतो' थी, जो 'से' के अर्थ में जाती थी । बहुत दिनों तक बोला जाता रहा । वलो’ आादि उर्दू के प्रराने शायरों तक में यह विभक्ति मिलती है । कबीरदास ने भी इसका व्यवहार किया है, जैसे तोहि पीर जो प्रेम की पाका सेंती खेल । तुलसीदास जी ने इसका कहीं व्यवहार किया है या नहीं, ठीक ठीक नहीं कह सकते पर जायसी इसे बहुत जगह लाए हैं, जैसे (क) सबन्ह कहा मन समझहु राजा काल सेंति के जू न छाजा ॥ (ख) रतन युवा जिन्ह " हाथन्ह सेंती ।