पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/१९६

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१४
पदमावत

१४ पदमावत हिय न समाई दीठि नहि जानह ठाढ़ कहूँ लगि कहीं ऊँचाई, कहें लगि बरनों फेर 1१६। निति गढ़ बाँचि चले ससि सूरू । नाहि त होइ बाजि रथ चूरू । पौरी नवौ बत्र साजो। सहस सहस तटें बैठे पाजी फिरंहि पाँच कोतवार सुभौंरी । काँसें पार्श्व चपत बह पौरी ॥ पौरिहि पौरि सिंह गढ़ि कारें । डरपहि लोग देखि तहूँ ठाढ़े ॥ बहुबिधान वे नाहर गढ । जन गार्जाहि, चाहहि सिर चढ़े । टह , पसारह जीहा। कुंजर डरह कि गुंजरि लीहा ॥ कनकसिला गढ़ि सीढ़ी लाईं । जगमाहि गढ़ पर ताई । नव वंड नव पौरीग्र तबत्र केवार । चारि बसेरे स चहैसत स उतरे पार ॥१७। नव पौरी पर दसवें दुधारा। तेहि पर बाज राज परिया ॥ घरी सो बैठि गौ घरियारी। पहर पहर सो श्राप बारी ॥ जबहीं घी पूजि तेहूँ मारा । घरी घरी घरियार पुकारा ॥ परा जो डाँड़ जगत सब डाँड़ा। का निचित माटी कर भड़ा ? ॥ तुम्ह तेहि चाक चढ़े ही काँचे । अजाएह रहै न थिर होइ बाँचे ! घरी जो भरी घटी तुम्ह शाक' का निश्चित होड़ सोड बटाऊ ? । पहह पहर गजर निति होई। हिया बजर, मन जाग न सोई ॥ महमद जीवन जल भरन, रईंटघरी के रीति । घरी जो माई ज्यों भरीढरीजनम गा बीति 1१८॥ गढ़ पर नीर खीर दुडू नदी । पनिहारी जैसे दुरपदी और कुंड एक मोतीचूरू अमत । पानी , कीच कपूरू । मोहि क पानि राजा पै पीया। बिरिध होइ नहि जौ लहि जीया ॥ कंचनबिरिछ एक तेहि पासा। जस कलपतरु इंद्र कबिलासा ॥ म् ल पतार, सरग ओोहि साखा । अमरबेलि को पाव को चाखा ? ॥ चाँद पात 3 फूल तराईं। होइ उजियार नगर जदें ताई ॥ वह फल पावं तप करि कोई । बिरिध खाइ ती जोबन होई। । राजा भए भिखारी सुनि वह अमृत भोग । जेइ पावा सो अमर भा, ना कि व्याधि न रोग 1१९। गढ़ पर बसह चारि गढ़पती। ग्रसपति, गजपति, भनरपती । सब धौराहर सोने साजा। अपने अपने घर सब राजा ॥ करिन्ह = दिग्गजों । (१७) पाजी = पैदल सिपाही । कोतवार = कोटपाल, कोतवाल लीहा = गरज कर लिया। । गुंजरि बसेरा = टिकॉन । (१८) रहूंटघरी = रहट में लगा छोटा घड़ा। घरियार = घंटा । घरी भरी = घड़ी पूरी हुई (पुराने समय में समय जानने के लिये पानी भरी नाँद में एक घड़िया या कटोरा महीन महीन छेद करके तैरा दिया जाता था ।