पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/२०८

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(६) रत्नसेन जन्म वंड चित्र सेन चितउर गढ़ राजा। के गढ़ कोट चित्र सम साजा ॥ तेहि कुल रतनसेन उजियारा। धनि जननी जनमा बस बारा ॥ पंडित गनि सामुद्रिक देखा। देखि रूप 3 औी लखन बिसेखा ॥ रतनसेन "रतन-जोति ॥ यह कुल निरमरा। मन माथे परा पदुम पदारथ लिखो सो जोरी । चाँद सुरुज जस होइ गुंजोरी ॥ जस मालति भौंर वियोगी। तस औोह लागि होइ यह जोगी । कह सिंघलदीप जाइ यह पावै। सिद्ध होइ चितउर लेइ ग्रावे ॥ भोग भोज जस माना, विक्रम साका कीन्ह । परखि सो रतन पारखी सबै लखन लिखि दीन्ह ॥ १ ॥ () पदुम लक्ष्य है । भोज = १= पदमावती की ओर भोज = राजा । लखन लक्षण ।