पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/२१०

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पदमावत

हों बाम्हन औौ पंडित, बह प्रापन गु न सोइ । पट्टे के प्रागे जो पड़ेदून लाभ तेहि होइ ॥ ३ ॥ तब गुन मोहि अहाहो देवा। जब पिंजर हुत छूट परेवा ॥ अब ग न कौन जो , जजमाना । घालि जैसा बेचे जाना ॥ पंडित होइ सो हाट न चढ़ा । चहीं बिकायेभूलि गा पढ़ा॥ दुइ मारग देखीं यदि हाटा । दई चलावे दहें केहि बाटा ॥ रोवत रकत भए मुख राता। तन भा पियर कहीं का वाता ? राते स्याम कंठ दुइ गोवाँ । तेहि दुह फद डरो सुठि जोवा ।॥ व हीं कंठ खुद दुइ चोन्हा । दहें ए फंद चाह का कोन्हा ? ॥ पढ़ि गनि देखा बहत में, सोइ धंध जगत सब जानि , भलि रहा बधि खोइ ॥ ४ ॥ सुनि बाम्हन बिनवा चिरिहारू । करि पंखिन्ह कहूँ मया न मारू ॥ निठुर होइ जिद बसि परावा हत्या केर न ताहि डर ग्रावा ॥ कहसि पंखि का दोस जनावा। तेइ जे परसेंस खाबा ।। श्रावहि रे इ, जात पुनि रोना । तबहूं न तजह भोग सुख सोना ॥ ऑी जानहि तन हाइहि नासू । पार्टी माँ पराय माँसू जो न होहि मस परसेंस खाधू । कित पंखिन्ह कहें धरे बियाधू ? जो व्याधा नित पंखिन्ह धरई । सो बेचत मन लोभ न करई ॥ बाम्हन सु वे साहा, सुनि मति वेद गरंथ । मिला भाई के साथिन्ह, भा चितउर के पंथ 1 ५ ॥ तब लगि चित्र सेन सर साजा। रतनसेन चित उर भा राजा ॥ थाइ बात तेहि भागे चलो। राजा बनिज प्राए सिंघलो । हैं गजमोति भरो सब सोपो । और वस्तु बहु सिंघलदीपो । बाम्हन एक सुश्रा लइ ग्रावा। कंचनबरन ग्र न प। ॥ सहाबा राते स्याम कंठ दुइ काँठा। राते डहन लिखा सब पाठा ॥ श्री दुबे नयन सुहासन राता। राते ठौर अमीरस बाता ॥ मस्तक टीका, काँध जनेऊ । कवि बियासपंडित सहदेऊ ॥ बाल प्ररथ साँ वो, सुनत सीस सब डोल । राज मंदिर महें चाहियअस वह सुथा अमोल ॥ भ रजाइ जन। दस दौराए । बाम्हन सुग्रा बेगि लेइ ग्राए । विप्र असोस विनति ग्रीधा । सा जोर नहि करों निनारा ॥

  • यह पेट महा विसवासो। : इ सत्र नाव तपा सन्यासो ॥

(३) पतंगभंड़ारे = चिड़ियों के मड़रे में वा झावे में । = चंचल, चल हिलता डोलता। (४) में जूस = मंजूषा, डला। कंठ - कंठा, काली लाल फकीर जो तोतों के गले पर होतो है। । धुंध = अंधकार । (५) परसेंस = दूसरे का मांस । = खानेवाला । (६) सर साजा = चिता पर चढ़ा; मर गया । खाध