पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/२११

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बनिजारा खड

बनिजारा खंड २७ लाने " डासन सेज जहाँ किछु नाहीं । भुईं परि रहै लाइ गिउ बाहीं ॥ ग्राँधर रहै, जो देख न नैना । चूंग रहै, मुख आाव न बैना ॥ बाहिर रहै, जो सेवन न सुना। पे यह पेट न रह निरगुना ॥ के के फेरा निति यह दोखी। बारह बार फि, न सैंतोखी ॥ सो मोहि लेइ , मंगावलाव भूख । पियास जो न होत अस , केह न केह के ग्रास ॥ ७ । सुश्रा आसोस दीन्ह बड़ साजू । बड़ परताप अखंडित राजू ॥ भागवंत विधि बड़ औौतारा। जहाँ भाग तहूँ रूप जोहारा ॥ कोइ केह पास आास के गौना। जो निरास डिढ़ आासन मौना ॥ कोई बिनु पूछे बोल जो बोला । होइ बोल माटो के मोला ॥ पढ़ि गुर्नि जानि वेदमति भेऊ। पूछे बात करें सहदेऊ । गुनी न कोई घायु सराहा । जो बिकाइ, गुन कहा सो चाहा ॥ जौ लगि गुन परगट नह होई। तो लहि मरम न जाने कोई ॥ चतुरवेद हीं पंडित, हीरामन मोहि नाँव । पदमावति सर्वे मेरवीं, सेब क” तेहि ठावें 1 ८ ॥ रतनसेन हीरामन चीन्हा । एक लाख बाम्हन कहें दोन्हा ॥ विश्र असीसि जो कीन्ह पयाना । सुथा सो राजमंदिर महें जाना ॥ बरन काह सुथा भाखा । धनि सो नावें हीरामन राखा ॥ जो बोले राजा मुख जोवा। जानौ मोतिन हार परोवा ॥ जौ बाल तौ मानिक म"गा। नाहि त मौन बाँध रह ग गा । मनहें मारि मुख अमृत मेला। गुरु होइ आापकोन्ह जग चेला ॥ सुरुज चाँद के कथा जो कहेऊ । प्रेम के कहनि लाइ चित गहेज ॥ जो जो सुनै धुनै सिर, राजह प्रीति अगाह । ग्रस नबंता नाहि भल, बाउर करिहै काहु ॥ & ॥ (७) बिसवासी = विश्वासघाती । नाव = नवाता है, नम्र करता है । न रह निरगुना = अपने गुण या क्रिया के बिना रहता। बारह बार के द्वार नहीं द्वार। (८) डिढ़ = दृढ़ । मेरवीं = मिला। (९) बाउर = बावला, पागल ।