पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/२४९

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पदमाधती सुधा भेंट खंड ६७ सो नग देखि हींछा भइ मोरी। है यह रतन पदारथ जोरी ॥ है ससि जोग है मै भानू । तहाँ तुम्हार में कीन्ह बखान ॥ कहाँ रतन रतनागर, कंचन कहाँ सुमेर । दैव जो जोरी दुहूँ लिखी, मिलै सो कौनए फेर ॥ ३ ॥ सुनत विह चिनगो नोहि परी। रतन पाव जर्नी कंचन को कठिन पेम बिरहा दुख भारी। राज छाँड़ेि भा जोगि भिखारी ॥ मालति लागि भर जस होई। होइ बाउर निसरा बुधि बोई ॥ कहेति पतंग होइ धनि लेऊ। सिंघलदीप जाइ जि दे ॥ पुनि श्रोहि कोउ न छाँड़ अकेला । सोरह सहस कुंवर भए चेला ॥ और गर्न को संग सहाई ? । महादेव मढ़ मेला जाई ॥ सूरज पुरुष दरस के ताई। चितवे चंद चकोर के नाई ॥ तुम्ह बारी रस जोग जेहि, कंवलहि जस आधानि तस सूरज परगास है, भौंर मिलाएड यानि 1 ४ । हीरामन जो कहो यह बाता । सुनिई रतन पदारथ राता ॥ सूरज देखे होइ औोपा। भा बिरह तस 'कामदल कापा ॥ सुनि के जोगी केर बखानू । पदमावत मन भा अभिमान कंचन करी न काँचहि लोभ। जाँ मग होड़ पाव तब सोभा ॥ कंचन जौं कसिए क के ताता। तब जानिय दहें पीत कि राता ॥ नग कर मरम सो जड़िया जाना। उड़े जो अस नग देखि वखाना। को अब हाथ सिंघ मुख घाल। को यह बात पिता साँ वाले ॥ सरग इंद्र डरि काँपं, बासुकि ड कहाँ सो अस बर प्रिथिमी, मोहि जोग संसार ॥ ५ ॥ तू रानी ससि कंचन करा। वह नग रतन सूर निरमरा । बेिरह बजागि बीच का कोई । अगि जो छूने जाई जरि सोई ॥ नागि झाइ परे जल गाढ़े । वह न बुझांझ ग्राह्य हो बाहै । बिरह के ` आागि सूर जरि काँपा। रातिहि दिवस जरै ओोहि तापा। खितह सरगखिन जाइ पतारा। थिर न रहै एहि आागि अपारा । धनि सो जीउ दगध इमि सहै । अकसर ज, न दूसर कहै । सुलगि सुलग भीतर होझ सावां। परगट होइ न कहै दुख नावाँ ॥ रतनागर = रत्नाकर, सम ह । चिनगी = चिनगारी। कंचन करी=स्वर्णकलिका । लागि = लिये, निमित्त। मेला पहुँचा। दरस के ताई = दर्शन के लिये । (५) राता = अनुरक्त हुआा । ओोप = दमक। ताता = गरम । पोत कि राता = पीला कि लालपोला सोना मध्यम और लाल चोखा माना जाता है । (६) करा = कला, किरन । बजागि = वनाग्नि । अकसर = अकेला। सावाँ श्याम, साँवला