पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/२५१

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पदमावती सुधा भेंट खंड भगी श्रोहि पांखि प लेई । एकहि बार छीनि जिउ देई ।। ताकतें शुरू करें स माया। नव श्रौतार दे, नव काया ॥ होइ अमर जो मरि के जीया। भौंर कवल मिल के मधु पीया ॥ ग्रावें ऋतु बसंत जब तब मधुकर तव बासु । जोगी जोग जो इमि करै सिद्धि समापत तासु ॥ € ॥


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(६) फनिंग = फनगा, तिगा। समापत = गें ।