पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/२५३

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७१
वसंत खंड

बत ख ७१ चलीं पउनि सब गोहने फूल डार लेइ हाथ । बिस्वनाथ पूजा, पदमावति साथ । करौल सहाय चलीं फुलवा। फर फूलन सब करहि धमारी । आा आापु महें करहि जोहारू। यह बसंत सब कर तिवहा ॥ चहै मनोरा मक होई। फर नौ फूल लिए सब कोई ॥ फागु बलि पुनि दाहब होरी। मैं तब खे उडाउब गोरी आज साज पुनि दिवस न पूजा । खेलि बसंत लेहु के पूजा ॥ भा`प्रायस पदमावति के रा । बहरि न माइ करव हम फेरा ॥ तस हम कहें होइहि रखवारी। पुनि हम कहाँकहाँ यह बारी ॥ पुनि रे चलव घर आपने, पूजि बिसेसर देव । जैहि काहुति होइ खेलना, नाजु खेलि दति लेव ॥ ४ ॥ काहू गही ग्राँव के डारा। काह जाँव विरह अति झारा कोई नारंग कोड झाड़ चिरौजो। कोई कटहर, बड़हर, कोइ न्योजी ॥ कोइ दारि* कोइ दाख नौ खीरो । कोइ सदाफरतुरंज जंभीरी । कोइ जायफरलौंग ,सुपारी । कोइ नरियरकोइ गुवा, छोहारी ॥ कोइ बिजौर, करौदा जू । कोई अमिली, कोइ महु, खजूरी ॥ काह हरफारेवरि कसौंदा । कोई भंवरा, कोइ राय कौंदा ॥ काहु गही केरा के घौरी । का हाथ परी निवकौरी ॥ काहू - पाई नीयरे, कोउ गए किटु दूरि । मरि काहू 'खेल भएउ . बिषकाहू अमृत ॥ ५ ॥ पुनि बोनहि सब पूल सहेली । खोजह आस पास सब बेली ॥ कोइ केवड़ाकोइ चंद नेवारी। कोइ केतकि मालति फुलवारी ॥ कोइ सदबंगकुंदकोइ करना। कोइ चमेलि, नागेसर बरना कोइ मौलसिरि, पुडुप बकरी कोई रूपमंज गौरी कोइ सिगारहार तेहि पाँहा। कोइ सेवती, कदम के छाहाँ !। कोइ चंदन फूलह जनु फूली । कोइ अजान वीरो तर भूलो ॥ (कोइ) फूल पाव, कोई पाती, जेहि के हाथ जो आंट । कॉट (कोहार अरूझाना ) चोर , जहाँ बुरी ततें ॥ ६ ॥ डार= डला। () = होलो की क्रीड़ा । जोहर = प्रणाम आदि। ४धमारि मनोरा झूमक = एक प्रकार के गोत जिसे स्त्रियाँ खंड बाँधकर गाती हैं; तब इसके पद में ‘' यह वाक्य प्रत्यक मनोरा झूमक होआाता है । = समेट कर इकट्ठा करेंगी। (५) जाँवु.झारा=जान जो विरह की ज्वाला । से झुलसी सी दिखाई देती है। न्योजीचि लगाँजा । खोरी = खिरनी । गुवा वाक, दक्खिनी सुपारी । (६) कूजा कुजक, सफेद जंगलो गुलाब । गौरी = मल्लिका। जानबोरो = एक बड़ा पेड़ जिसके संबंध में कहा श्वेत जाता है जाने से को जाती कि उसके नीचे आदमी सुध ब्ध भूल है ।