पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/२६४

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८२
पदमावत

८२ पदमावत तू मन नाथु मारि साँसा । जो पै मरहि अवहि करु नासा । परगट लोकचार कह बाता । गुपुत लाउ मन जासों राता ॥ हीं हाँ' कहत सवें मैति खोई । जाँ तू नाहि प्राहि सब कोई ।। जियतह जुरै मरे एक बारा । पुनि का मीलू, को मारे पारा ॥ आपुहि गुरु सो आपुहि चेला । औपुहि सब औौ श्रा अकेला ! । नापुहि मीच जियन पुनि, जापुहि तन मन सोइ ! आापुहि ना करे जो चाहै, कहाँ सो दूसर कोइ ? 1१०। लोकचार = लोकाचार की । जु। = जुट जाय