पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/२७४

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पदमावत

पदमावत जब लगि गुरु हों अहा न चोन्हा। कोटि ऑतरपट बीचहि दीन्हा ॥ जब चोन्हा तब ऑौर न कोई । तन मन जिउ जीवन सब सोई ॥ हो हीं करत धोख इतराहों । जय भा सिद्ध कहाँ परछाहीं ? ॥ मारै गु रू, कि गुरू जियावै। ऑौर को मार ? मरै सब प्रावै । सूरी में लु, हस्ति करु चूरू । हों नह जान ; जाने गए। ॥ रू हस्ति पर चढ़ा सो पेखा। जगत जो नास्ति, नास्ति प देखा । ध मोन जस जल महें धावा। जल जीवन चल दिस्टि न आावा । गुरु मोरे मोरे हिये, दिए तुरंगम ठाठ । भौतर करह डोलाव, बाहर नाच काठ। सो पदमावति गुरु हीं चेला। जोग तंत जेहि कारन खेला ॥ तजि वह बार न जानों दूजा । जेहि दिन मिलेजातरा पूजा ॥ जीउ कातुि भुईं धर्ण लिलटा । मोहि कहें देऊँ हिये महें पाटा : ॥ को मोहि श्रोहि प्रावै पाया। नव प्रव तारदेइ नई काया। जीउ चाहि जो आर्थिक सियारो। माँ जोउ दे बलिहारी ॥ माँ सोसदेखें सह गोवा। यधिक तरों जर्थों मारे जीवा ॥ अपने जिक्र कर लोभ न मोहों। पेम बार होइ माँगों औोही ॥ दरसन मोहि कर दिया जस, हीं सो भिखरि पतंग । जो करवत सिर सारे, मरत न मोरों अंग : ८ । पदमावति कंवला ससि जोती। हँसें , रोवे सब मोती ॥ बरजा पिते हंसो औो रोजू । लागे दूतहोड़ निति खोज ॥ जबहि सुरुज कहें लागा राहू। तबहि कंबल मन भएड प्रगाह ॥ विरह अगस्त जो विसमी उए। सरवर हरप सूचि सब गएऊ । परगट ढारि सके नहि ग्राँसू । घटि घटि माँसू गुपुत होइ नासू ॥ जस दिन माँ रंनि होड़ थाई। विगसत कंवल गएड मुरझाई ॥ राता बदन गएज हो सेता। भंवत भंवर रहि गए प्रचेता ॥ चित्त जो चिता कोन्ह धनि, रो रोचें । समेत सहस साल सहि, ग्राहि भरि, मुरुछि परीगा चेत 1 & ॥ (७) ग्रहा = था। बेंतरपट = परदा, व्यवधान । इतराहीं =इतराते हैं, गर्व करते करु व च र करे, पास डाल पं = ही । जल जीवन आावा = जल यह है, नहीं सा जोवन चंचल यह दिखाई देता है । ठाठ = रचना, ाँचा। का = ज ड वस्तु, शरोरा (८) जातरा पूजा = यात्रा सफल हुई । पाटा = fस हासन = मारा ' । करव सिर सारे सिर पर चलावे । (8) रोज = ' रोदन, । बा चो सो । अगस्त = एक नक्षत्र, जैसेउदित अगस्त पंथ रीना न जल सोखा । बिसमों बिना समय के । भंवत भंवर "चेता = डोलते हुए भरे अर्थात् पुतलियाँ निश्चल हो गई ।