पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/२७५

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गंधर्वसेन मंत्री खंड ९३ पदमावति सँग सखी सयानी। गनत नखत सब रैनि बिहानी ॥ जानहि मरम केंवल कर कोईं। देखि बिथा बिरहिन के रोई ॥ बिरहा कठिन काल के कला। बिरह न सहै, काल बरु भला ॥ काल काढ़ि जिउ लेइ सिधारा । बिरह काल मारे पर मारा ॥ बिरह नागि पर मेले मागी। बिरह घाव पर घाव बजागी । विरह बान पर बान पसारा। बिरह रोग पर रोग सँवारा ॥ बिरह साल पर साल नवेला। बिरह काल पर काल दुहेला ॥ तन रावन होइ सर चढ़, बिरह भयउ हनुवंत । जारे ऊपर जा त्रित मन करि भसमंत 1१०। कोइ कुमोद पसाह पाया। कोइ मलयागिरि निरकहि काया । कोइ मुख सीतल नीर चुनावै । कोइ चल सौं पौन डोलावे ॥ कोइ मूख अमृत आानि निचोवा। जन बिष दीन्ह, अधिक धनि सोवा ॥ जोवहि साँस खनहि खिन सखी। कब जिउ फिरै पौन पर पंखी । बिरह काल होइ हिये पईठा। जीउ काढ़ि ले हाथ बईठा । खिनहि मौन बाँध, खिन खोला। गही जीभ मुख श्राव न बोला। खिनहि बे ि बानन्ह मारा। कैपि पि नौरि मरै बेकरारा ॥ कैसेहु बिरह न , भा ससि गहन गरास । नखत चहूँ दिसि रोवहअंधर धरति प्रकास ॥११। घरी चाहि इमि गहन गरासी। पुनि विधि हिये जोति परगासी ॥ निर्मास ऊमि भरि लीन्हेसि साँसा। भा अधार, जीवन के आासा ॥ बिनवहि सखीट ससि राइ। तुम्हरी जोति जोति सब काहू । तू ससि बदन जगत उजियारी। केइ हरि लीन्ह, कोन्ह अंधियारी ? ॥ तु गजगामिनि गरव गहेली। अब कस आास छड़ तू बेली ॥ हरिलंक हराए केहरि। अब कित हारि करति है हियहरि ॥ तू कोकिल बैनी जग मोहा। केइ व्याधा होइ गहा निछोहा । वल कली तू पदमिति ! गई निसि भयड बिहान । अब, न संपुट खोलसि, जब रे उमा जग भानु 1१२। ॥ भानु नार्वे सुनि कंवल बिगासाफिर भौंर लोन्ह मधु बासा ॥ सरद चंद मुख जवह उघेलीनैन केली ॥ । खंजन उठे करि विरन बोल भाव मुख ताई। मरि मरि बोल जीउ बरियाई ॥ (१०) कला = काल । नवेला कोई = कुमुदिनी, यहाँ सखियाँ। काल के के रूप = वे करारा = नया । (११) पौनपर = पवन के परवाला अर्थात् वायु रू । बेचैन बेकरार । अंधर = अँधेरा। (१२) तू हरिलंककेहरि = तूने सह से कटि छीनकर उसे हराया। हारि करति है = निराश होती है, हिम्मत हारती है । निोहा = निष्ठुर । (१३) फिरि के भरमधू बासा = भौंरों ने फिर मधुवास लिया अर्थात् काली पुतलियाँ लीं । बरियाई = जबरदस्ती