पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/२७८

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पदमावत

& ६ पदमावत अनु रानी तुम गुरु, वह चेला। मोहि बूझह के सिद्ध नवेला ॥ तुम्ह चेला कहें परसन भई। दरसन देइ ऐंडप चलि गई ॥ रूप गुरू कर चेले डीठा। चित समाइ होइ चित्र पईठा ॥ जीडें काढ़ि ले तुम्ह आपसई । वह भा कया, जीव तुम्ह भई ॥ कया जो लाग धूप औौ सीऊ। क्या न जान, जान जीऊ ॥ भोग तुम्हार मिली मोहि जाई। जो मोहि बिथा सो तुम्ह कहूँ आई ॥ तुम हिके घट, वह तुम माहाँ। काल कहाँ पावै वह छाहाँ ? ॥ अस वह जोगी अमर भा, परकाया परवेस । श्रावै काल, रुहि तहूँदेखि सो करै देस ॥२०॥ सुनि जोगी के अमर जो करनी। नेवी बिथा बिरह के मनी ॥ कर्बल करी होइ बिगसा जीऊ । जनु रवि देखि यूटि गा सीज ॥ जो आस सिद्ध को मा पारा ? । निपुरुष तेइ जर्र होइ छारा ॥ कही जाइ अब मोर फंदे । तजौ जोग अब, होहु नमू ॥ जिनि जानहु हों तुम्ह स दूरी । नैनन माँझ गड़ी वह सूरी। तुम्ह परसद घटे घट केरा। मोहि घट जीव घटत नहि बेरा ॥ तुम्ह कहें पाट हिये महें साजा । अब तुम मोर दुहूँ जग राजा ॥ ज रे जियहि मिलि गर रंहि, मरह तो एकै दो। तुम्ह जिउ कहें जिनि होई कि, मोहि जिज होउ सो होउ 1२१। । (२०) अनु = फिर, आगे । मोहि ह"नवेला = नया सिद्ध बनाकर उलटा मुझसे पूछती हो। ग्रसई व ल दा । सोऊ = शीत । अदेस करें नमस्कार करता है; 'श्राद श [ ६ ' यह ऋ णाम साों में प्रचलित है । । (२१) नेवरी = निबटी, टो । निपुरुप = पुरुषार्थहोन। सूते यू ली जो रत्नसेन को दी जानेवाली है । परसेद = प्रस्वेदपसोना। घट = घटने पर । बेरा = बेर देरवित्र ।