पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/३४५

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लक्ष्मी समुद्र खंड १६३ भु क़ती साँठि गाँहेि जो करें। साँकर परे सोइ उपकरै । जेहि तन पंव, जाइ जहूँ ताका । पैग पहार होइ जौ थाका । लछमो दीन्ह । रहा मोहि बोरा। भरि के रतन पदारथ होरा ॥ काहि एक नग वेगि तंजावा। बहुरी लच्छिफेरि दिन पावा ॥ दरव भरोस करें जिनि कोई। सभर सोई गाँठि जो होई ॥ जोरि कटक पुनि राजा, घर कहें कीन्ह पयान । दिवसहि भानु प्रलोप भा, बासुकि इंद्र सकान ॥ २८ । --:०:-- सू = कतो = बहुत सो, कि । साँकर परे = फट पड़ ने प र । उपकरै उपकार करती है। काम आ तो है। । साँ भर संघ त, राह का खर्च । स ान = डरा।