पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/३५७

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राघवचेतन देशनिकाला खंड १७५ जो यह दुइज कहि के होती। नाजु तेज देखत ससि जोती । राघव दिस्टिबंध कल्हि खेला। सभा माँ चेटक अस मेला ॥' एहि कर गुरू चमारिनि लोना। सिखा कवरू पाढ़न टोना ॥ दुइज अमावस कहूँ जो देखावे। एक दिन राहु चाँद कहें लावें । राज बार एस गुनी न चाहिय जेहि टोना के खोज । ऐहि चेटक नौ विद्या छला जो राजा भोज ॥ ३ । राघव वैन जो कंचन रेखा कसे बानि पीतर अस देखा । अज्ञा भई, रिसान नरेम । मारह नाहि, निसारहु देसू ॥ झूठ बोलि थिर रहै न रॉचा। पंडित सोड़ वेद मत साँचा ॥ वेद बचन मुख सच जो कहा। सो जुग जुडग अहथिर होड़ रहा। खोट रतन सोई फटकरे । केहि घर रतन जो दारिद हरें ? चहै लच्छि बाउर कवि सोई। जहूँसुरसती लछि कित होई कविता सँग दारिद मतिभंगो। काँटे कट पूहप के संगी । कवि तो चेला, बिधि ग रू, सीप सेवाती बद । तेहि मानुष के आास का, जो मरजिया समुंद ।। । एहि रे बात पदमावति सुनी। देश निसारा राघव गुनी । ज्ञान दिस्टि धनि अगम विचारा। भल न कीन्ह अस नी निसारा ॥ जेइ जाखिनी पूजि ससि काढ़ा। स्र के ठाँव करै पुनि ठाढ़ा ॥ कवि के जीभ खड़ ग हरद्वानी। एक दिसि आागि, दुसर दिसि पानी । ॥ जिन अ गुति कारे सुख भोरे । जस बहुते, अपजस होइ रानी गहन राघव बेगिन सूर भा उतारा। हंकारा। लेह ॥ बाम्हन जहाँ दच्छिना पावा । सरग जाइ जौ होइ बोलावा ॥ थावा राघव। चेतन, वराहर के पास ऐस न जाना ते हिये, बिजुरी बसें अकास ॥ ५ ॥ काल्हि के =कल को। दिस्टिबंध = इंद्रजाल, जादू । चेटक = माया । चमारिन लोना = कामरूप की प्रसिद्ध जादूगरनी लोना चमारी । एक दिन राहु चाँद करें। लावे = (क ) जब चाहे चंद्रग्रहण कर दे, (ख) पद्मावती के कारण बादशाह की चढ़ाई का संकेत भी मिलता है । । (४) फटक = फटक दे। मतिभंगी = वद्धि भ्रष्ट करनेवाला। तेहि मनु ष के आास का = उसको मनुष्य की क्या आशा करनी चाहिए ? (५) अगम - आगम, परिणाम । जोखिती = यक्षिणी। सूर के ठॉव ‘ठाढ़ा = सूर्य की जगह दूसरा सूर्य खड़ा कर दे। (राजा पर बादशाह को चढ़ा लाने का इशारा है ।) हरद्वानी=हरद्वान को तलवार प्रसिद्ध थी। अजुतिनहोनी बातअयुक्त बात । भोरे = भूलकर । जस बहुतेथोरे यश बहुत करने से मिलता है, अपयश थोड़े ही में मिलता है। उतारा = निछावर किया हश्रा दान । १. पाठांतर-—पंडित न होड़, कांवरू चेला। २२