पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/३६१

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राघवचेतन दिल्ली गमन खंड १७७ भीख भिखारी दीजिएका बाम्हन का भट ग्रज्ञा रंकारह, धरती धर लिलाट राघव चेतन हुत जो निरासा। ततखत गि बोलावा पासा ॥ सीस नाइ के दीन्ह न सोसा। चमकत नग कंकन कर दोसा ॥ प्रज्ञा भइ पुनि राघव पाहाँ । तू मंगन कंकन का बाहाँ । ‘र।घव फेरि सीस भर्ती धरा। जग जज ग राज भान के करा पदमिनि सिंघलदीप के रानी। रतनसेन चितउरगढ़ आनी ॥ करौल न सरि पूजे तेहि बासा। रूप न पूछे ॥ चंद अकासा जहाँ करौल ससि सूर न पूजा। केहि सरि देखेंऔर को दूजा ? । सोइ रानी संसार मनि दछिना कंकन दीन्ह । अशो रूख देखाइ जोउ झरोखे लोन्ह 1 ४ सुनि के उतर साहि मन हँसा । जानह बोउ चमक परगसा । कांच जोग हि कंचन पावा। मंगन ताहि सुमेरु चढ़ावा नार्वे भिखारि जीभ मख बाँचो। अबद संभारि बात कह साँची ।। कहें अ' नारि जगत उपराहीं । जेहि के सरि सूरज ससि नाहों ? ॥ जो पदमिति सो मंदिर मोरे। सातौ दीप जहाँ कर जोरे । सात दीप मढ़ चनि चनि मानी। सो मोरे सोरह रानी ॥ से । जौ उन्ह के देसिस एक दासो। देखि लोन होइ लोन बिलासो ॥ चह्न खंड हों चकफर्टजस रवि तपे अकास जो पदमिनि तो मोरेअछी तौ कबिलास ॥ ५ ॥ तुम बड राज छत्रपति भारी। अन बाम्हन में अहाँ भिखारी चारिउ खंड भोख कहें बाजा। उदय अस्त तुम्ह ऐस न राजा। धरमराज सत कलि माहाँ। भूठ जो कहै जोभ केहि ?॥ औौ पाहाँ किg जा चादि सब किछु उपराहों में से एहि जंबू वपईि, ना! पदमिनि, अं सू त, हंस, सलूरू । सिंघलदीप मिलह से शुरू । ॥ सातौ दीप देखि हीं नावा। तब राघव चेतन कहावा याज्ञा होइ, न खाँ धोखा कहाँ सब नारिन्ह गुन दोषा इहाँ हस्तिनी, संखिनी, औौ चित्विनि बहु बास । कहाँ पदमिनी पदुम सरि, भंवर फिर जहि पास ? ॥ ६ ॥ । (४) हुत = था। संसार मनि =जगत् में मणि के समान । (५) जेहि कंचन पावा – जिससे सोना पाया । भिखारिबाँची नावें = भिखारी के नाम पर बची हुई है, खोंच नहीं ली गई। लोन : , सौंदर्य होइ तू नमक लाव। लोन बिलासी = की तरह गल जाय । वक्की = चक्रवर्ती । (६) अनु = औौर, फिर ।'भीख कहें = भिक्षा के लिये । बाजा = पहुँचता है, डटता है । उदय अस्त - उदयाचल से अस्ताचल तक । किछु चारि"उपराहीं = जो जो चार चीजें सबसे ऊपर हैं । मूरू = मूल, असल । बह बहत सी रहती बास =