पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/३६३

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स्त्रीभेद वर्णन वंड १८ १ खीर खाँड़ रुचि अलप हारू। पान फूल तेहि अधिक पियारू ॥ पदमिनि चाहि घाटि दुइ करा । ऑौर संवै गुन श्रोहि निरमरा ॥ चिविनि जैस कुमुद रैग, सोइ बासना अंग । पदमिनि सब चंदन असि, भंवर फिरह तेहि संग 1 ३ ॥ चौथी कहीं पदमिनो नारी। पदुम गंध ससि दैछ सँवारी ॥ पदमिनि जाति पदुम ग श्रोही। पदुम बास, मधुकर सँग होहीं । ना सठि लबोन स2ि छोटी। ना सुठि पातरि, ना सुठि मोटी ॥ , ना सोरह करा मोहि बानी। सो, सुलतान ! पदमिनी जानी ॥ रंग दीरथ चारि, चारि लघु सोई। सुभर चारि, चहें खीनौ होई ॥ नौ ससि बदन देखि सब मोहा। बाल मराल चलत गति सोहा ॥ खीर अहार न कर सुकुवाँ। पान फूल के रहै अधारी ॥ सोरह करा पूरन, श्री सोरही सिंगार । अब मोहि भाँति कहत हों, जस बरनै संसार ॥ ४ ॥ प्रथम केस दोरघ मन मोहै। न दीरष अंगूरी कर सोहै । दीरष नैन तोख त: देखा। दीरघ गी , कंठ तिनि रेखा । पुनि लघ दसन होहि जन होरा । औ नौ लघु कुच उतंग भीरा ।। लघु , लिलाट दूइज , चंदन परगा। अा नाभो लघुबास ॥ नासिक खोन खरंग के धारा। खीन लंक जन केहरि हारा । खीन पेट जानलें नहि माँता। खीन अधर बिद्र म रेंग राता ॥ सुभर कपोल, देख मुख सोभा । सुभर नितंव देखि मन लोभा । सुभर सोरह कलाई सिंगार अति बरनि बनी, , सुभर करहि जंघदेवता , गज लाल चाल । ॥ ५ । जज क। " चाहि = अपेक्षा, बनिस्बत । घाटि = घटकर । करा=कला। बासना = बास, महें। (४) सुर्खिबबहुत । दीरप चारि होइ = ये सोलह श्रृंगार के विभाग हैं । (५) दोरप डी लंबे] तीख = तीखे। तिनि = तीन। केहरि हाराः = सिंह ने हार कर दी । ऑाँता तड़ी सुभर = भर हुए । लाल = लालसा