पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/३६५

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पद्मावती रूपचर्चा खंड १८३ बेनी छोरि झार जौ केसा। रैनि होइ जग दीपक लेसा ॥ सिर ढंत बिसहर परे ईं बारा। सगरी देस भएड धियारा ॥ राकपकाहि बिष भरे पसारे। लहरि भरे लहकहि अति कारे। जानतें टह चढ़े भुजंगा। वेधे बास मलयगिरि गंगा ॥ लुरतिं रह जनु मानह कैली । नाग व ठे मालति लहरें देह जनह कालिदोफिर फिरि भंवर होइ चित बंदो ।। चेंबर टू रत ग्राऊँ चढ़ पाता। भंवर न उड़हि जो बुध वासा । होव चैंधियार व धन, लेलैं जबहि चोर गहि केiए। केस नाग कित देख में, वरि मुंवरि जिय काँप ॥ ४ ॥ माँग जो मानिक । जतु बसंत राता देखा सेंदुर रेखाजग ॥ पत्नावलि पाटी पारी। श्री रुचि चित्र विचित्र सँवारी । भए उरेह पहप नामा। सब जन बग बिखरि रहे घन सामा। जमुना माँ सुरसती मंगा । दुहू दिति रही तरंगिनि गंगा सैदुर रेख सो ऊपर राती। वोरवहटिन्ह के जरिस पाँती । बलि देवता देखि । भए सेंचूरूपूरे माँग भोर उ3ि सूरू । भोर साँत रबि होइ जो राता । श्रोहि रेखा राता होइ गाता ॥ बेनी कारी पुरूप लेइ, निकसी जमुना प्राइ । पूज इद्र मानद स, सेंदर सीस चढ़ाइ ॥ ५ ॥ दुइज लिलाट अधिक मनियारा। संकर देखि माथ त: धारा ॥ यह निति दुइज जगत सब दीसा। जगत जोहा देइ असीसा । ससि जो होइ नहि । होइ सो अमावस छपि लार्ज ॥ सरवरि छाजे मन तिलक सँवारि जो चुन्नी रची। दुइज माँ जानते कचपची ॥ ससि पर करवत राहभरा दीन्ह सारा । नखतन्ह वड़ दाहू । पारस जोति लिलाटहि ओोतो। दिस्टि जो करें होइ तेहि जोती॥ सिरी रतन जो माँग बैठारा। जानह गगन ट निसि तारा ॥ ससि श्र सूर जो निरमल तेहि लिलाट के ओोप । निसिस दिन दौरि न पूजह पुनि पुनि होहि अलोप ॥ ६ ॥ (४) झार झारती है । जग दीपक लेसारात समझकर लोग दीया जलाने लगते हैं। सिर । बिसहर हुत = सिर से = विषधर साँप । सकपकाहि हिलते डोलते हैं । लहकहि= लहराते हैं झपटते हैं । लू रहि = लोटते हैं । फिरि फिर दो, धुवा। भवर = पानी के भंवर में चक्कर खाकर । बंदो= हुरत = ढरता रहता है । झाँप = ढाँकतो है । (५) पत्रावलि = पत्रभंग- छाछ रचना। पाटी = के दोनों '। उरेह = विचित्व माँग ओोर बैठाए हुए बाल. सजावट। बग बगला । पूरी = पूजन करता है । (६) मनियारा = कांतिमान संहावना । चुनी = चमकी या सितारे जो माथे या कपोलों पर चिपकाए जाते हैं । पारस जोति = ऐसी जोति जिससे दूसरी वस्तु को ज्योति हो जाय । सिरो = श्र नाम का प्राभूषण । थोप = चमके। पूजह = बराबरी को पहुँचते हैं ।