पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/३६८

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पदमावत

१८६ वन सुनह जो कुंदन सपो। पहिरे कुंडल सिंघलदीपी चॉद मरज दुहें दिति चमकाहीं । नखतन्ह भरे निरखि नहीं जाहीं ॥ खिन खिन १रह बीजू अल काँया। कुंवर मेघ महें रहीह में झॉप। सूक सनीचर दृहें दि िमते । निनार न बनन्ह ढते ॥ काँपत रहहिं बोल जो खंगा। मुवनन्ह जौ लागह फिर नैना ॥ जस जस बात सखिन्ह सीं सुना। दृहें दिसि बरह सीस वे चूना ॥ छूट दुघौ ग्रस दमकहि बुंटो । जनहु परै कचपचिया टूटी ॥ वेद पूरान ग्रंथ जत, वन, सुनत सिखि लीन्ह । नाद विनोद राग रस बंधक नवन मोहि विधि दीन्ह 1 १३ ॥ केवल कोल ओोहि आस छाजे । गौर न काह इंउ अस साज। ॥ पुडुप पं क रस अमिय सँवारे। स रंग नारंग गद रतनारे पुनि कपोल बाएँ तिल पर। । सो तिल चिनगि ॥ बिरह के करा जो तिल देरठ जाइ जरि सोई बाएँ दिस्टि काह जिनि होई ॥ जानतें मैंबर पद्म पर टटा। जीउ दीन्ह औौ दिए न छूटा | देखत तिल नैनन्ह सके छड़ी । गा गाड़ी। गौर न सो तिल नेहि पर ग्र लक मनि जी डोला। । वै सुरंग कपोल ॥ सो नागिनि रच्छा करै मयर वहहिय कर । , नाँधि न लोट गति रे जग को स छुइ है, दुई पहर के नोट ।। १४ ॥ गीउ मयूर केरि जस ठहों। । धनि वह गाउ का बरन करा। बाँक तरंग जनतें गहि परा ॥ फेरि टेरे काढ़ो। थिरिनि परेवा गोड उठवा । च है बोल तम र सनाव । । गाउ राही के मस भई। पियाला कारन न। पुनि तेहि ठव परी निनि रेबा। ने सोइ ठाँव ह६ ज दे। ॥ नमिय सुरुज किरिनि ढंत गिड निरमली। देखे वेग जाति हि से । कंचन तार सोइ भरा। कंवल लो जिन साजि तेहि उपर धरा ॥ नागिनि चढ़ने केंद्र ल पर चढ़ि के । बठ कर्मठ कर पसार जो काल कह लागे श्रोहि कंठ ॥ सो ॥ १५ व ( (१३) कुंदन सोपो = कुदन को सीप (ताल के सीपों का आाधा संपुट) । अबर = बरत्र । ऐंट = भोर । खट खंट नाम का गहना । कचपचिया कोना, = ' = कत्तिका नक्षत्र । १४) पुत्र पंक, = फल का कीचड या पराग। । के करा = के रूप स1 बाएँ दस्टि. ..होई दष्टि ोर न जाए वह , के है । गा गाड़ो = गड़ गया। ड पहार अथात् : । किसो की बाई क्योंकि तिल । पर । कुंदरें = । करा = कल । घिरिनि = देने (१५) कुंदे = खराद कबूतर । । तेइ सोश ठाऊँ..देखा = जो उसे देखता है वह उसी । श!भाअरेवा गिरहबाज तम चूर = मग जगह क रह जाता है। जाति हिथ चलो = हृदय में बस जाती है। । के अशत केश : कर्मठ = कछुए के समान पीठ या खोपड़ी । नागिनि