पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/३६९

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पद्मावती रूपचर्चा खंड १८७ कनक दंड भुज बनी कलाई। डाँड़ी डैवल फेरि जनु लाई ॥ चंदन खभहि भुजा सँवारी । जानतें मेलि कंवल पौनारी । तेहि डड़ी संग कैवल हथोरी । एक कवल के दूनी जोर सहजह जानहु मेहंदी रची। मुकृताहल लीन्हें जनु सुंघच ॥ करपल्लव जो हथोरिन्ह साथा । पे सब रकत भरे तेह था । देख्त हिया काहूि ज लेई । हिया का हि दी जइ न देई ॥ कनक अँगूठी औौ नग जरी। वह हत्यारिनि नतन्ह भरे ॥ जैसी : भजा कलाईनेहि विधि जाइ र भाखि । ककन हाथ हो जहूँ, ततें दरपन का सावि ? ॥ १६ । हिया थार कुछ कनक कचरा । जा हूं बुवाँ सिफल जोरा ॥ एक . पाट नौ राजा। साम छह दुनन्हें सिर छाजा ॥ जान, दो लटू एक साथा ! जग भा लहू के नहि हाथा । पातर पेट माहैि जनु पूरी । पान प्रधार फूल आस पूरी ॥ रोमावलि ऊपर लट घम। जानह दोड सम ग्र रूमा ।। अलग भुगंगिति देहि पर ला दिय र एक खेल दुइ गोट ॥ बान पगार उठे कुच दोऊ । नाँथि सरन् उन्ह १ाय काउ । कैस ह नवहि ने नाए, जोबन गरव उठान । जो पहिले कर लावे सो पाछे रति मान ॥ १७ ॥ ‘ग लंक जनु माँ ने लगा। दुइ ठंड नलिन मां तनु तागा । जब फिरि लो देख में पाये। अछरी इंद्रलोक जनु काल । जबहि चली मनभा पछिता। अबढ़ें दिस्टि लागि यह ट्राके है। मुठरी लाजि छप * गति प्रोही। भई अलोष न परगट होहों । हंस लजाइ मानसर खेले । हस्ती लाजि धूरि सिर मेले । जगत बहुत तिय देखी महूँ। उदय अस्त अस नारि न कहें।। महिमंडल तो ऐसि न कोई। ब्रह्म सैंडल जौ होइ तो हो ।। बरनेनारि जहां लगि, दिस्टि झरोखे या । और जो अही अदिस्ट धनि, सो कछ बरत न जइ 1 १८ ॥ का धनि कहाँ जैसि गुरु मारा। फूल के झुए होझ वेकरा ॥ (१६) कंवल डड्री लाई = कमलनाल उलटकर रखा हो। कर पलब = उंगली। सखि = साक्षी । कक्न हाथ..साखि = हाथ कंगन को चार सो बया ? (१७) कचोरा = कटोरा । पाट = सिहासन । साम न = प्रथम च का ललट लटट शाम नाम अग्रभाग । = । पूरी = पूली । साम = गोटा सौरिया का मुल्क जो अरब के उत्तर है । घर = खाना काठा । गोटी । पगार = प्राकार या परकोटे पर । (= देखखा। खेले = १८) देख चले गए। ब्रह्मभंडल = स्वर्ग। (१६) बेकरारा =बेचैन।