पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/३८

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है
(१८)

( १८ ) केवल बारह वर्ष का था, बड़ी वीरता के साथ लड़कर जीता बच आाया । उसके मुह से अपने पति की वीरता का वृत्तांत सुनकर गोरा की स्त्री सती हो गई । 'अलाउद्दीन ने सवत् १३४६ (सन् १२९० ई०; पर फरिश्ता के अनुसार सन् १३०३ ई० जो कि ठीक माना जाता है) में फिर चित्तौरगढ़ पर चढ़ाई की। इसी दूसरी चढ़ाई में राणा अपने ग्यारह पुत्रों सहित मारे गए। जब राणा के ग्यारह पुत्र मारे जा चुके और स्वयं राणा के युद्ध क्षेत्र में जाने की बारी आाई तब पद्मिनी ने जौहर किया। कई राजपूत ललनाओ के साथ पद्मिनी ने चित्तौरगढ़ के उस गुप्त भूधरे में प्रवेश किया जहाँ उन सती स्त्रियों को अपने गोद में लेने के लिये आग दहक रही थी । इधर यह कांड समप्त हुआा उधर वीर भीमसी ने रणक्षेत्र में शरीर त्याग किया' टाड ने जो वृत्त दिया है वह राजपूताने में रक्षित चारणों के इतिहासों के आधार पर है । दो चार व्योरों को छोड़कर ठीक यही वृत्तांत ‘अईने अकबरी' में दिया हश्रा 'अईने अकबारी'में भीमसी के स्थान पर रतनसी (रत्नसिह या रत्नसेन) नाम है। रतनसी के मारे जाने का ब्योरा भी दूसरे ढंग पर है । 'अईने अकबरी'में लिखा है कि अलाउद्दीन दूसरी चढ़ाई में भी हारकर लौटा । वह लौट कर चित्तौर से सात कोस पहुँचा था कि रुक गया और मैत्री का नया प्रस्ताव भेजकर रतनसी को मिलने के लिये बुलाया। अलाउद्दीन की बार बार को चढ़ाइयों से रतनसी ऊब गया था इससे उसने मिलना स्वीकार किया । एक विश्वासघाती को साथ लेकर वह अलाउद्दीन से मिलने गया और धोखे से मार डाला गया । उसका संबंधी अरसी चटपट चित्तौर के सिंहासन पर बिठाया गया। अलाउद्दीन चित्तौर की ओोर फिर लौटा और उसपर अधिकार किया। अरसी मारा गया और पद्मिनी सब स्त्रियों के सहित सती हो गई । इन दोनों ऐतिहासिक वृत्तों के साथ जायसी द्वारा वर्णित कथा का मिलान करने से कई बातों का पता चलता है । पहली बात तो यह है कि जायसी ने जो ‘रत्नसेन'नाम दिया है यह उनका कल्पित नहीं है, क्योंकि प्रायः उनके समसामयिक या थोड़े ही पीछे के ग्रंथ 'आइने अकबरी'में भी यही नाम आया था । यह नाम अवश्य इतिहासज्ञो प्रसिद्ध में था।जायसी को इतिहास की जानकारी थी। यह ‘जायसी की जानकारी' के प्रकरण में हम दिखावेंगे । दूसरी बात यह है जायसी ने रत्नसेन का मुसलमानों के हाथ से मारा जाना लिखा है उसका आधार शायद विश्वासघाती के साथ बादशाह से मिलने जानेवाला यह प्रवाद हो जिसका उल्लेख आइने अकबरीडकार ने किया है। अपनी कथा को काव्योपयोगी स्वरूप देने के लिये ऐतिहासिक घटनाओं के व्योरों में कुछ फेरफार करने का अधिकार कवि को बराबर रहता है । जायसी ने भी इस अधिकार का भी उपयोग कई स्थलों किया है। सबसे पहले तो हमे चेतन की कल्पना मिलती है । इसके उपरांत अलाउद्दीन के चित्तौरगढ़ घेरने पर संधि की जो शर्त (समुद्र से पाई हुई पाँच वस्तुओं को देने की) अलाउद्दीन की ओर से पेश की गई वह भी कल्पित है ।इतिहास में दर्पण के बीच पद्मिनी की छाया देखने की शर्त प्रसिद्ध है । पर दर्पण के प्रतिबिंब देखने की बात का जायसी ने।