पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/३७

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( १७ ) सिंहल के चौहान राजा हम्मीर शंक की कन्या पद्मिनी से हुआ था जो रूप गुणों में जगत् में अद्वितीय थी । उसके रूप की ख्याति सुनकर दिल्ली के बादशाह अलाउद्दीन ने चित्तौरगढ़ पर चढ़ाई को । घोर युद्ध के उपरांत अलाउद्दीन ने संधि का प्रस्ताव भेजा कि मुझे एक बार पद्मिनी का दर्शन ही हो जाय तो मैं दिल्ली लौट जाऊँ। इसपर यह ठही कि अलाउद्योन दर्पण में पद्मिनी की छाया मात्र देख सकता है । इस प्रकार युद्ध बंद हुआ और अलाउद्दोग बहुत थोड़े से सिपाहियों के साथ चित्तौरगढ़ के भीतर लाया गया । वहाँ से जब वह दर्पण में छाया देखकर लौटने लगा तब राजा उसपर पूरा विश्वास करके गढ़ के बाहर तक उसको पहुँचाने आया। बाहर अलाउद्दीन के बहुत से सैनिक पहले से घात में लगे हए थे । ज्यों ही राजा बाहर चाया, वह पकड़ लिया गया औौर मुसलमानों के शिविर में, जो चित्तौर से थोड़ी दूर पर था, कैद कर लिया गया। राजा को कैद करके यह घोषणा की गई कि जबतक पद्मिनी न भेज दी जायगी, राजा नहीं छूट सकता। चित्तौर में हाहाकार मच गया। पद्मिनी ने जब यह सुना तब उसने अपनेो मायके के गोरा और बादल नाम के दो सरदारों से मंत्रणा की । गोरा पद्मिनी क चाचा लगता था और बादल गोरा का भतीजा था । उन दोनों ने राजा के उद्धार की एक युक्ति सोची । अलाउद्दीन के पास कहलाया गया कि पद्मिनी जायगी, पर रानी की मर्यादा के साथ। अलाउद्दीन अपनी सब सेना वहाँ से हटा दे और परदे का पूरा इंतजाम कर दे। पद्मिनी के साथ बहत सी दासियाँ रहेंगी औौर दासियों के सिवा बहुत सी सखियाँ भी होंगी जो केवल उसे पहुँचाने और विदा करने जायेंगी । अंत में सौ पालकियाँ अलाउद्दीन के खेमे की ओर चलीं । हर एक पालकी में एक एक सशस्त्र वीर राजपूत बैठा था। एक एक पालकी उठानेवाले जो छह छह कहार थे वे भी कहार बने हुए सशस्त्र सैनिक थे । जब वे शाही खेमे के पास पहुँचे तब चारों ओर कनातें घेर दी गईं । पालकियाँ उतारी गई । पद्मिनी को अपने पति से अंतिम भेंट करने के लिये आधे घंटे का समय दिया गया । राजपूत चटपट राजा को पालकी में बिठाकर चित्तौरगढ़ की ओर चल पड़े । शेष पालकियाँ मानो पद्मिनी के साथ दिल्ली जाने के लिये रह गईं । अलाउद्दीन की भीतरी इच्छा भीमसी को चित्तौरगढ़ जाने देने की न थी । देर देखकर वह घनराया । इतने में पालकियों से वीर राजपूत निकल पड़े । अलाउद्दीन पहले से सतर्क था। उसने पीछा करने का हुक्म दिया । पालकियों से निकले हुए राजपूत बड़ी वीरता से उन पीछा करनेवालों को कुछ देर तक रोके रहे पर अंत में एक एक करके वे सब मारे ‘इधर भीमसी के लिये बहुत तेज घोड़ा तैयार खड़ा था। । वह उसपर सवार होकर गोरा बादल आादि कुछ चुने साथियों के साथ चित्तौरगढ़ के भीतर पहुँच गया । पीछा करनेवाली मुसलमान सेना फाटक तक साथ लगी आाई । फाटक पर घोर युद्ध हुआ। गोरा बाँदल के नेतृत्व में राजपूत वीर खूब लड़े । अलाउद्दीन अपना सा मुहँ में लेकर दिल्ली लौट गया; पर इस युद्ध में चित्तौर के चुने चुने वीर काम आए। गोरा भी इसी युद्ध में मारा गया। बादल,जो चारणों के अनुसार