पृष्ठ:जायसी ग्रंथावली.djvu/४०६

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२२४
पदमावत

२२४ बिगसा कंवल सरग निति, जनहें लोकि गइ बीच । ओोहि राहु भा भानुहि, राघव मनह पतीलू 1२ अति विचित्र देखा सो ठाढ़ी। चित के चित्र, लीन्ह जिउ काढ़ी । सिंघ लंक, कुंभस्थल जोरू । अफुस नाग, महाउत मोरू । तेहि ऊपर भा केबल बिगासू । फिरि अलि लीन्ह पहुप मधु वासू ।॥ दुइ खंजन विच बैठेउ सूझा। दुइज क चाँद धनुक लेइ ऊा ।। मिरिग देखाइ गवन फिरि किया । ससि भा नागसूर भा दिया। सुठि ऊँचे देखत वह उचका। दिस्टि पहुंचि, कर पहुंचि न सका । पहुँच बिहन दिस्टि कित भई ?। गति न सका, देखत व गई ।। राघव ! हेरत जिउ गएड, कित थात जो प्रस ॥ यह तन राख पाँख सकै न, केहि अपराध ? 1२१॥ राघव सुनत सीस भुईं धरा । जुग जुग राज भानु के करा । उह कला, वह रूप बिसेखी। निसचें तुम्ह पदमावति देखी ।। केहरि लंक, कुंभस्थल हिया। गीउ मयूरअलक बेधिया । बल बदन ओो बास सरीरू। खंजन नयन, नासिका कीरू ।। भौंह धनक, ससि दुइज लिलाट। सब रानिन्ह ऊपर मोहि पाट । सोई मिलिंग देखाइ जो गएऊ। बेनी नागदिया चित भएऊ ।। दरषन महें देखी परछाहीं । सो मूरति, भीतर जिज नाहीं ॥ सवे सिंगार बनी धनि, अब सोई मति की । न तक जो लटके आधर पर सो गहि के रस लीज ॥२२। चमक उठी, दिखाई पड़ गई । (२१) चित के चित्र = वित्त या हृदय में अपना चित्र पैठाकर। कुंभस्थल जारू हाथी उठ जोड़ा (अर्थात् दोनों कुच) । झाँकृस नाग = साँपों (अर्थात् बाल की लटों) का अकुश। मोस्स = मयूर। सिरिग = अर्थात् मृगनयनी पद्मावती । गबन फिरि किया के पीछे फिर चली गई। स िभा नाग = उसके पीछे फिरने से चंद्रमा के स्थान पर नाग हो गया, अर्थात् मुख के स्थान पर वेणी दिखाई पड़ी । सूर भाग दिया = उस नाग को देखते ही सूर्य (बादशाह) दीपक के समान तेजहीन हो गया (ऐसा कहा जाता है कि साँप के सामने दीपक की लौ झिलमिलाने लगती है) । पहुँच बिरौनकित भई ? = जहाँ पहुँच ही नहीं हो सकती वहाँ दृष्टि क्यों जाती है ? हेरत जिउ गएउ = देखते हो मेरा जीव चला गया । कित थाछत जो असाध = जो वश में नहीं था वह रहता कैसे ? यह तन ‘अपराध = यह मिट्टी का शरीर पब लगाकर क्यों नहीं जा सकता; इसने क्या अपराध किया है ? (२२) बेधिया = बंध करनेवाला अकुश । श्रोहि = उसका । दिया चित भएट = वह तुम्हारा चित्र था जो नाग के सामने दीपक के समान तेजहीन हो गया। मति कीज = ऐसी सलाह या युक्ति कीजिए अलक " रस लीज = साँप की तरह जो लट हैं उन्हें पकड़कर अधर रस लीजिए (राजा को पकड़ने का इशारा करता है) ।